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आदमी का व्यवहार
कविता

आदमी का व्यवहार

सुरेन्द्र कल्याण बुटाना करनाल (हरियाणा) ******************** आदमी को समझना इतना आसान नहीं होता, चेहरा तो हर कोई पढ़ लेता है, लेकिन चेहरे के पीछे छिपे आदमी को पढ़ना हर किसी के बस की बात नहीं। वह मुस्कुराता है तो जरूरी नहीं कि भीतर खुश हो, कई बार मुस्कान भी दर्द छिपाने का सबसे सुंदर तरीका होती है। वह चुप रहता है तो जरूरी नहीं कि उसके पास कहने को कुछ नहीं, कभी-कभी बहुत कुछ कह देने के बाद आदमी चुप होना सीख जाता है। रिश्ते भी अजीब हैं- जब तक आदमी काम आता है, तब तक अपना है। जिस दिन उसके हाथ खाली हो जाएँ, उसी दिन कई रिश्तों की असलियत सामने आने लगती है। कुछ लोग आपके सुख में आपसे ज्यादा खुश दिखाई देंगे, लेकिन आपके दुख में उनकी व्यस्तताएँ अचानक बढ़ जाएँगी। कुछ लोग आपके आँसू देखकर कंधा नहीं देंगे, बस इतना पूछेंगे- "हुआ क्या?" ...
भीड़ का आदमी
कविता

भीड़ का आदमी

सुरेन्द्र कल्याण बुटाना करनाल (हरियाणा) ******************** सबके साथ चलता हुआ आदमी धीरे-धीरे अपने साथ चलना भूल गया। वह हर बात पर सहमति में सिर हिलाता रहा, यह जाने बिना कि एक दिन उसका अपना सिर उसकी अपनी बात के लिए बचा ही नहीं। अब वह भीड़ में है, सुरक्षित भी, स्वीकार भी। बस, आदमी नहीं रहा। परिचय :-  सुरेन्द्र कल्याण बुटाना जन्म : २१ जून १९९५ निवासी : ग्राम बुटाना, जिला जिला करनाल (हरियाणा) प्रकाशित कृतियां : हिंदी कहानी पुस्तक "प्रतिज्ञा दोस्ताना (गज़ब दोस्ताना)", हरियाणवी कविता संग्रह "समाज" शामिल हैं। रुचि : हिंदी एवं हरियाणवी भाषा में काव्य लेखन के साथ पटकथा लेखन, संवाद लेखन तथा स्वतंत्र फिल्म निर्देशन में भी रुचि रखते हैं। विशेष : आपकी रचनाओं के केंद्र में मानवीय संवेदना, सामाजिक यथार्थ, ग्रामीण जीवन, करुणा, पर्याव...
मनुष्य होने का अर्थ
कविता

मनुष्य होने का अर्थ

सुरेन्द्र कल्याण बुटाना करनाल (हरियाणा) ******************** मनुष्य होना केवल दो पैरों पर चलना नहीं है, न ही ऊँची इमारतें बनाना, समुद्रों को मापना या आकाश को छू लेना। मनुष्य होना एक भावना है, एक उत्तरदायित्व है, एक सतत संघर्ष है अपने भीतर की रोशनी को बचाए रखने का। जब पृथ्वी पर पहला मनुष्य आया होगा, तब उसके पास न धन था, न सत्ता, न विज्ञान। उसके पास केवल जीवन था और जीवन के प्रति एक आश्चर्य था। वह नदी को देखकर मुग्ध होता था, पेड़ों को देखकर प्रसन्न होता था, और आकाश को देखकर अपने छोटे होने का एहसास करता था। समय बीतता गया सभ्यताएँ बनीं, नगर बने, राज्य बने, और फिर महत्त्वाकांक्षाएँ भी। मनुष्य ने ज्ञान अर्जित किया, नई खोजें कीं, असंभव को संभव किया। उसने पर्वतों को काटकर रास्ते बनाए, नदियों पर पुल बनाए, और अंतरिक्ष तक पह...
मनुष्य बचा रहे
कविता

मनुष्य बचा रहे

सुरेन्द्र कल्याण बुटाना करनाल (हरियाणा) ******************** युद्धों से नहीं, प्रेम से चलती है पृथ्वी। तलवारें सीमाएँ बना सकती हैं, घर नहीं। घृणा भीड़ जुटा सकती है, समाज नहीं। मैंने देखा है- एक सैनिक की माँ सीमा के दोनों ओर एक जैसी रोती है। एक बच्चे का भय किसी धर्म का नहीं होता। एक भूखे मनुष्य की रोटी किसी राष्ट्र की नहीं होती। फिर हम क्यों नामों, झंडों और दीवारों में मनुष्य को बाँटते हैं? समय की सबसे बड़ी आवश्यकता नई विजय नहीं, मनुष्य का बचा रहना है। क्योंकि यदि प्रेम हार गया, तो जीतकर भी हम हार जाएँगे। परिचय :-  सुरेन्द्र कल्याण बुटाना जन्म : २१ जून १९९५ निवासी : ग्राम बुटाना, जिला जिला करनाल (हरियाणा) प्रकाशित कृतियां : हिंदी कहानी पुस्तक "प्रतिज्ञा दोस्ताना (गज़ब दोस्ताना)", हरियाणवी कविता संग्रह "समाज"...
रोटी से आगे
कविता

रोटी से आगे

सुरेन्द्र कल्याण बुटाना करनाल (हरियाणा) ******************** रोटी से आगे भूख लगी हो तो रोटी ही सबसे बड़ा सत्य लगती है। पर जीवन केवल रोटी से नहीं चलता। मनुष्य को सम्मान भी चाहिए, अपनापन भी, और यह विश्वास भी कि उसका होना किसी के लिए मायने रखता है। कई लोग भरपेट भोजन के साथ भी अधूरे रहते हैं। और कई लोग कठिन परिस्थितियों में भी मुस्कुराते हैं। क्योंकि शरीर की भूख अन्न से मिटती है, पर आत्मा की भूख प्रेम, सम्मान और संवेदना से। यही कारण है कि सभ्यता की सबसे बड़ी चुनौती रोटी देना नहीं, मनुष्यता बचाए रखना है। परिचय :-  सुरेन्द्र कल्याण बुटाना जन्म : २१ जून १९९५ निवासी : ग्राम बुटाना, जिला जिला करनाल (हरियाणा) प्रकाशित कृतियां : हिंदी कहानी पुस्तक "प्रतिज्ञा दोस्ताना (गज़ब दोस्ताना)", हरियाणवी कविता संग्रह "समाज" शामिल हैं। रुचि :...
आदमी के भीतर
कविता

आदमी के भीतर

सुरेन्द्र कल्याण बुटाना करनाल (हरियाणा) ******************** आदमी के भीतर एक और आदमी रहता है। वह बाज़ार नहीं जाता, न किसी पद की इच्छा करता है। वह बस चाहता है कि दुनिया थोड़ी कम कठोर हो। लेकिन समय की धूल उसके चेहरे पर जमती रहती है। और एक दिन बाहर वाला आदमी सफल हो जाता है, पर भीतर वाला चुपचाप मर जाता है। परिचय :-  सुरेन्द्र कल्याण बुटाना जन्म : २१ जून १९९५ निवासी : ग्राम बुटाना, जिला जिला करनाल (हरियाणा) प्रकाशित कृतियां : हिंदी कहानी पुस्तक "प्रतिज्ञा दोस्ताना (गज़ब दोस्ताना)", हरियाणवी कविता संग्रह "समाज" शामिल हैं। रुचि : हिंदी एवं हरियाणवी भाषा में काव्य लेखन के साथ पटकथा लेखन, संवाद लेखन तथा स्वतंत्र फिल्म निर्देशन में भी रुचि रखते हैं। विशेष : आपकी रचनाओं के केंद्र में मानवीय संवेदना, सामाजिक यथार्थ, ग्रामीण जीवन, करुणा,...