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आदमी का व्यवहार

सुरेन्द्र कल्याण बुटाना
करनाल (हरियाणा)

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आदमी को समझना
इतना आसान नहीं होता,
चेहरा तो
हर कोई पढ़ लेता है,
लेकिन चेहरे के पीछे छिपे
आदमी को पढ़ना
हर किसी के बस की बात नहीं।

वह मुस्कुराता है
तो जरूरी नहीं
कि भीतर खुश हो,
कई बार मुस्कान भी
दर्द छिपाने का
सबसे सुंदर तरीका होती है।

वह चुप रहता है
तो जरूरी नहीं
कि उसके पास कहने को कुछ नहीं,
कभी-कभी बहुत कुछ कह देने के बाद
आदमी चुप होना सीख जाता है।

रिश्ते भी अजीब हैं-
जब तक आदमी
काम आता है,
तब तक अपना है।

जिस दिन
उसके हाथ खाली हो जाएँ,
उसी दिन
कई रिश्तों की असलियत
सामने आने लगती है।

कुछ लोग
आपके सुख में
आपसे ज्यादा खुश दिखाई देंगे,
लेकिन आपके दुख में
उनकी व्यस्तताएँ
अचानक बढ़ जाएँगी।

कुछ लोग
आपके आँसू देखकर
कंधा नहीं देंगे,
बस इतना पूछेंगे-
“हुआ क्या?”

और कुछ ऐसे भी होंगे
जो बिना पूछे
आपके पास बैठ जाएँगे।

यही अंतर है
जान-पहचान और
अपनेपन में।

आदमी अक्सर
दूसरों के व्यवहार की
शिकायत करता है,
लेकिन भूल जाता है
कि उसके व्यवहार से भी
किसी का दिल दुखा होगा।

हम चाहते हैं
लोग हमें समझें,
लेकिन कितनी बार
हमने किसी दूसरे को
समझने की कोशिश की?

हम चाहते हैं
लोग हमारी मजबूरी देखें,
लेकिन कितनी बार
हमने किसी और की
मजबूरी को महसूस किया?

हम सम्मान चाहते हैं,
पर सम्मान देने में
हमारा अहंकार
बीच में आ जाता है।

हम प्रेम चाहते हैं,
लेकिन प्रेम के बदले
अपनी अपेक्षाओं की
एक लंबी सूची थमा देते हैं।

यही तो है
आदमी का व्यवहार-

वह दूसरों से
वह सब चाहता है
जो खुद करने से
कई बार बचता है।

समय बदलता है,
लोग बदलते हैं,
रिश्ते बदलते हैं,
लेकिन सबसे अधिक
बदलता है
आदमी का व्यवहार।

कल जो व्यक्ति
आपके बिना एक दिन
नहीं रह सकता था,
आज आपके संदेश का
उत्तर देने के लिए
समय नहीं निकाल पाता।

कल जिसकी आवाज़ में
अपनापन था,
आज उसी आवाज़ में
औपचारिकता होती है।

शायद इसलिए नहीं
कि आदमी बुरा हो गया है,
बल्कि इसलिए
कि उसकी प्राथमिकताएँ
बदल गई हैं।

फिर भी
हर बदलते व्यवहार को
धोखा कहना भी
सही नहीं।

कभी-कभी
आदमी खुद से लड़ते-लड़ते
इतना थक जाता है
कि दूसरों के लिए
पहले जैसा नहीं रह पाता।

इसलिए
किसी के बदलने से पहले
उसकी परिस्थितियों को भी
समझ लेना चाहिए।

क्योंकि
हर कठोर आदमी
निर्दयी नहीं होता,
कुछ लोग
बहुत कुछ सहकर
कठोर हुए होते हैं।

हर चुप आदमी
घमंडी नहीं होता,
कुछ लोग
बार-बार टूटकर
चुप हुए होते हैं।

हर दूर जाने वाला
बेगाना नहीं होता,
कुछ लोग
अपने भीतर की लड़ाई में
इतने उलझे होते हैं
कि किसी के करीब
नहीं आ पाते।

इसलिए
मनुष्य को
उसके एक व्यवहार से
नहीं आँकना चाहिए।

उसकी पूरी कहानी
जानने की
कोशिश करनी चाहिए।

क्योंकि आदमी
एक दिन का व्यवहार नहीं,
पूरी जिंदगी का
अनुभव होता है।

और अंत में
शायद मनुष्य होने का
सबसे बड़ा अर्थ यही है-

हम किसी के व्यवहार से
घायल होने के बाद भी
अपना व्यवहार
मानवीय रखें।

किसी ने हमें
अपमान दिया हो
तो भी हम
सम्मान देना न छोड़ें।

किसी ने हमें
अकेला छोड़ा हो
तो भी हम
जरूरतमंद का हाथ
थामना न छोड़ें।

क्योंकि

दुनिया में अच्छे लोग
कम नहीं हुए हैं,
बस उनके अच्छे होने की
आवाज़ कम है।

और शायद
मनुष्य की असली पहचान
इससे नहीं होती
कि उसके साथ
लोग कैसा व्यवहार करते हैं-

असली पहचान तो इससे होती है
कि वह दूसरों के साथ
कैसा व्यवहार करता है।

परिचय :-  सुरेन्द्र कल्याण बुटाना
जन्म : २१ जून १९९५
निवासी : ग्राम बुटाना, जिला जिला करनाल (हरियाणा)
प्रकाशित कृतियां : हिंदी कहानी पुस्तक “प्रतिज्ञा दोस्ताना (गज़ब दोस्ताना)”, हरियाणवी कविता संग्रह “समाज” शामिल हैं।
रुचि : हिंदी एवं हरियाणवी भाषा में काव्य लेखन के साथ पटकथा लेखन, संवाद लेखन तथा स्वतंत्र फिल्म निर्देशन में भी रुचि रखते हैं।
विशेष : आपकी रचनाओं के केंद्र में मानवीय संवेदना, सामाजिक यथार्थ, ग्रामीण जीवन, करुणा, पर्यावरण और समकालीन चिंतन प्रमुख रूप से रहते हैं। आपकी रचनाएँ विभिन्न साहित्यिक मंचों एवं पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। वर्ष २०१६ में प्रकाशित कविता “एक नज़र” के लिए उन्हें भारतीय दलित साहित्य अकादमी सम्मान प्राप्त हुआ।
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।

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