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पुस्तक के प्रश्न

सूर्यपाल नामदेव “चंचल”
जयपुर (राजस्थान)
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पुस्तकों की गोद
सूनी हो चली है
कि शब्द अब
गर्भधारण नहीं करते,
मशीनी मस्तिष्क की
फसल आ रही है
कि भाव अब सृजन का
कारण नहीं लगते।
पुस्तकालय की अलमारियां
बांझ बन रही हैं,
धूल की चादर ओढ़े,
कोई दिलासा से
सहलाते हाथ
तारण नहीं बनते।

तकनीक ही खुद से
कलम बन रही है,
शब्दकोश से शब्द चुनकर
कविता गढ़ रही है।
पुस्तकें ही प्रश्नचिन्ह बन
खुद खड़ी हो रही हैं
कि स्याही की बूंदों में अब
विचारों के भाषण नहीं सजते,

फिर भी कोई कोने में बैठा
कागज़ काला करता है,
भूखे पेट, गीली आँख से
सच को शब्दों में भरता है।
क्योंकि जब तक एक भी
कलम रक्त से लिखेगी,
पुस्तकों की गोद
फिर से हरी-भरी होगी।

परिचय :- सूर्यपाल नामदेव “चंचल”
शिक्षा : एम ए अर्थशास्त्र , एम बी ए ( रिटेल मैनेजमेंट)
व्यवसाय : उद्यमी, प्रबंधन सलाहकार, कवि, लेखक, वक्ता
निवासी : जयपुर (राजस्थान)
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरा यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है।

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