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सिधवा आदमी अउ सोझ गोठ

राजेन्द्र लाहिरी
पामगढ़ (छत्तीसगढ़)
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(छत्तीसगढ़ी बोली)

सिधवा आदमी अउ सोझ गोठ,
फांक मिलय चाहे कड़कड़ नोट,
छल-कपट के रस्ता ला छोड़,
सच्चाई से सदा रखथें जोड़,
मन के भीतर कोनो कसर नइ,
बाहर तौने, भीतर घलो वोइ,
नइ जानय वो चलाकी के खेल,
सबो संग रखथे मया के मेल,
अमृत बरोबर ओकर बानी,
सरल सुभाव ह ओकर निसानी,
दुनिया भले कहय ओला भोला,
परम संतोख के ओढ़े हे चोला,
मेहनत के ओ खाय कमाय,
कुटिल मन ओला कभू नइ भाय,
बांटय मया अउ बांटय हांस,
ओकर रहनी-कहनी म बिस्वास,
झूठ के कोठार ले वो दूर,
अपन धरम म रहिथे चूर,
पर पीरा ला अपन वो जानय,
सबो ला अपन संगी मानय,
लइका मन असन निस्छल हांस,
चंदन कस महके ओकर सांस,
दुनिया म अइसन मनखे हे अनमोल,
कोनो नइ लगा सकय ओकर मोल,
सिधवा रहि के जियत हे जीवन,
ओकरे दुआरे खुश हे भुवन।

परिचय :-  राजेन्द्र लाहिरी
निवासी : पामगढ़ (छत्तीसगढ़)
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।

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