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आत्म-मंथन
कविता

आत्म-मंथन

आरुषि कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** मैं-मैं में नहीं, मुझसे हूँ। हिम्मत नहीं है मुझमें फिर भी कहूँगी। समझ नहीं है मुझमें फिर भी लिखूँगी। अक्सर लोग निकाल देते हैं मेरे विचार को दिमाग से क्योंकि मैं-मैं में नहीं मुझसे हूँ। चाहती तो हूँ दुनिया से दूर रहना फिर सोचती हूँ मैं ही क्यों? क्यों कोई और नहीं? बस ऐसी ही बेतुकी-भरी ख़्वाहिशों में उलझी रहती हूँ। फिर मायूस होकर, गुमसुम-सी, मैं ख़ुद को ही अपने में समेट लेती हूँ। परिचय :- आरुषि शिक्षा : १२वीं कक्षा की छात्रा राजकीय उत्कृष्ट वरिष्ठ माध्यमिक पाठशाला गाहलियां निवासी : कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। प्रिय मित्र, शुभचिंतक एवं परिवारजन आपको प्रेषित मेरी नई स्वरचित रचना, कृपया लिंक को ...
जाति श्रम का विभाजन नहीं, श्रमिकों का विभाजन है
आलेख

जाति श्रम का विभाजन नहीं, श्रमिकों का विभाजन है

आरुषि कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** ऐसा कोई एक निश्चित वर्ष नहीं है जब जातिगत भेदभाव "शुरू" हुआ हो। यह बहुत लंबे समय के दौरान धीरे-धीरे विकसित हुआ। यह १५००–१००० ईसा पूर्व का समय था। इसकी जड़ें अक्सर ऋग्वेद के समय (लगभग १५००–१००० ईसा पूर्व) से जोड़ी जाती हैं। 'पुरुष सूक्त' नामक एक भजन में चार वर्णों (सामाजिक श्रेणियों) का वर्णन किया गया है। हालाँकि, इस चरण में, यह व्यवस्था उतनी कठोर या जन्म-आधारित नहीं थी, जैसी कि बाद के जातिगत भेदभाव में देखने को मिली। लेकिन धीरे-धीरे, ५०० ईसा पूर्व और ३०० ईसा पूर्व के बीच, 'मनुस्मृति' जैसे ग्रंथों ने सामाजिक पदानुक्रम को औपचारिक रूप देना शुरू कर दिया। इस दौरान, जाति व्यवस्था उत्तरोत्तर वंशानुगत और प्रतिबंधात्मक होती गई। शुद्धता, अपवित्रता और सामाजिक अलगाव की धारणाएँ और अधिक प्रबल हो गईं। यहाँ इसके कुछ सबसे क्रूर पहलू दिए गए ...