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Tag: डाँ. बबिता सिंह

शौर्य पुराण
कविता

शौर्य पुराण

डाँ. बबिता सिंह हाजीपुर वैशाली (बिहार) ******************** भारत भू का शौर्य पुराण, अतुलित है तेरा बलिदान विश्व की शान्ति दूत धरा है पर अरि जब देता ललकार, कभी ना मानी इसने हार जियो -जियो भारत के लाल! गंगा यमुना हिंद का सागर, तेरे पद-रज को लेकर ही पुण्य धरा को सिंचित करते वन पर्वत घाटी का ज़र्रा, तेरी साँसों से ही सहमते जियो-जियो भू के सरताज! अरि-दल में जिससे भय व्यापै, अपनी हड्डी की मशाल से नैनों में हालाहल भरके करते जुल्मी का संहार कौन लिखे इतिहास तुम्हारा? जियो-जियो ऐ पुण्य प्रकाश! अंबर पर घन जब छाएगा, तब-तब लहू बने चिंगारी जन्म-मरण का मोह छोड़कर, तुम हो जाते हो कुर्बान धरती माँ की आँख के तारे, जियो जियो भारत के भाल! धन साम्राज्य नहीं हैं माँगते, पर शत्रु जो आँख दिखाता तुरंत उतारते मौत के घाट निशक्त और निराश नहीं हैं करते हैं तम. का परिहार जि...
हमारा बिहार
कविता

हमारा बिहार

डाँ. बबिता सिंह हाजीपुर वैशाली (बिहार) ******************** जिला मोतिहारी बसें, सोमेश्वर महादेव। एक बार दर्शन करो, दुख सब हरें स्वमेव।। बैल राज्य का पशु है माना। शिव वाहन है सब जग जाना।। सोनपुर लगे मेला भारी। पशुओं की हो खरीददारी।। नीले नभ में पंछी घेरा। वन वृक्षों पर नीड़ वसेरा।। मधुबन में जब फूल खिले हैं। गौरैया को मोद मिले हैं।। गौरैया पक्षी सम्माना। दे उपाधि जन-जन हरषाना।। कोयल गावे जब सतरंगी। भरे उमंगें अति मनरंगी।। मलय श्वास सौरभ से लेकर। मदिर आस है अलि के अंतर।। राज्य पुष्प में गेंदा आता। हर मौसम में मन भरमाता।। वृक्ष लता के प्राण अनिल है। कचनारों पर रंग सकल है।। कर्म द्वार उदयाचल खुलता। श्रृंगार हीरक कुंज करता।। प्रथम विश्व गणराज्य है, माना गया बिहार। विल्ब वृक्ष में बस रहे, शंकर पालनहार।। पीपल राज्य वृक्ष में शोभित। थल नभचर को करता म...
डम-डम डमरू दिगम्बरा
भजन

डम-डम डमरू दिगम्बरा

डाँ. बबिता सिंह हाजीपुर वैशाली (बिहार) ******************** डम-डम डमरू दिगम्बरा, देवाधिदेव भगवान! जयति-जयति जगदीश्वरा। कर त्रिशूल कर्ण कुण्ड, जपता रहे मन पंचाक्षर! जयति-जयति जगदीश्वरा। भाल चन्द्र तन बाघम्बरा, शिवम् सत्यम् सुन्दरा ! जयति-जयति जगदीश्वरा। अंग विभूति छवि मनोहरा, नमामि सदा शिव शंकराय! जयति-जयति जगदीश्वरा। जगत सर्जन प्रलयंकरा, नाथ दयानिधि दानिशवरा! जयति-जयति जगदीश्वरा। सरल हृदय मेरे कालेश्वर, हे जटाधारी अभयंकरा! जयति-जयति जगदीश्वरा। पार्वती पति प्राणेश्वरा, विश्वनाथ विश्वंभरा! जयति-जयति जगदीश्वरा। श्री नीलकंठ सुरेश्वर, चन्द्रमौलि चिदम्बरा! जयति-जयति जगदीश्वरा। नागेन्द्रहारा हे गंगाधारा, जय-जय महायोगीश्वरा! जयति-जयति जगदीश्वरा। परिचय : डाँ. बबिता सिंह निवासी : हाजीपुर वैशाली (बिहार) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि...
कविता

आशा का परचम 

डाँ. बबिता सिंह हाजीपुर वैशाली (बिहार) ******************** सूर्य क्षितिज पर होता ओझल संध्या तुझे बुलाने को निशा हुई स्वप्निल लोरित उषा नागरी भी विह्वल है आशा का परचम लहराया। बहता सलिल समीर सदा से अनल जले आघातों से गति द्रव तेज सहे निर्झरिणी आकुल जलद का अंतर भी है आशा का परचम लहराया। नभ भी उतर-उतर शिखरों पर अवलोकित करते दृग  दर्पण गिरि का गौरव गाते झरने परिवर्तन हो रूप प्रकृति का आशा का परचम लहराया। आँचल में भू के है गंगा मोती की लड़ियों सी बहती जलद-यान में विचर के पावस नव किसलय पर स्नेह वार कर आशा का परचम लहराया। धूप-छाँह के रंग की किरणें पवन ऊर्मियों से लहराती हरित वर्णी पीपल छाया सोन खगों को सौंप के काया आशा का परचम लहराया। जीवन उन्नति के सब साधन फिर मानव क्यों करता क्रंदन? क्या जीवन की यही परिभाषा बोल पड़ी है मूक निराशा आशा का परचम लहराया...
फिर आ जाओ एक बार
कविता

फिर आ जाओ एक बार

डाँ. बबिता सिंह हाजीपुर वैशाली (बिहार) ******************** हे वीर पथिक, हे शुद्ध बुद्ध! निर्मित तुमसे नवयुग का तन, बुन के संस्कृत का महाजाल, तुम फिर आ जाओ एक बार! जग पीड़ित हिंसा से हे लीन भू दैन्य भरा है दीनों से पावन करने को हे अमिश, तुम फिर आ जाओ एक बार! चेतना, अहिंसा, नम्र, ओज तुम तो मानवता के सरोज तंत्रों का दुर्वह भार उठा तुम फिर आ जाओ एक बार! हे अमर प्राण! हे हर्षदीप ! जर्जरित है भू जड़वादों से, लेकर यंत्रों का सुघड़ बाण, तुम फिर आ जाओ एक बार! तुम शान्ति धरा के सूत्रधार, रणवीरों के तुम हो निनाद युग-युग का हरने विपज्जाल, तुम फिर आ जाओ एक बार! नवजीवन के परमार्थ सार, इतिहास पृष्ठ उद्भव प्रमाण, भारत का भू है बलाक्रांत, तुम फिर आ जाओ एक बार! हे सदी पुरुष, हे स्वाभिमान! तुम हो भारत के अमित प्राण, इस धरा का हरने परित्राण, तुम फिर आ जाओ एक ब...
मैं जलती रही
कविता

मैं जलती रही

डाँ. बबिता सिंह हाजीपुर वैशाली (बिहार) ******************** जग उठे कब ज्ञान इस संसार में प्रार्थना के पुण्य बल वरदान में साधना मेरी सफल हो जाएगी आस ले में रोशनी जलती रही। दूर हो तुम लौ दीया की मैं बनी धैर्य को बाँधे उम्र की डोर से संग मेरे कारवां चलता रहा आस ले मैं रोशनी जलती रही। कर निछावर अंतर तम से शब्द-शब्द चैन की आहुति दे कर ज्ञान यज्ञ हो के विह्वल मान को रच कर सदा आस ले मैं रोशनी जलती रही । मूल्य रस से पाल कर स्वाभिमान दे दीक्षा बस सम्मान का मुझको मिले जल उठो तुम ज्ञान के भंडार से आस ले मैं रोशनी जलती रही। नवकिरण बन जाओ तुम प्रभात की कुर्बान हो देश जग मान पर स्तंभ हो तुम भारत के आधार हो आस ले मैं रोशनी जलती रही। परिचय :- डाँ. बबिता सिंह निवासी : हाजीपुर वैशाली (बिहार) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचन...
स्वतंत्रता
कविता

स्वतंत्रता

डाँ. बबिता सिंह हाजीपुर वैशाली (बिहार) ******************** स्वतंत्रता प्रभात की खिलते हैं खलिहानों में वेदों से ले पुराणों में ऋषियों के आह्वान में प्रिय स्वतंत्र देश है गंगा पखारती जहाँ धरा ये विश्वेश है। क्षितिज गगन हरित है वन, सिद्धि औ यश का संचरण पवन-पवन कहे सदा स्वतंत्र मन प्यारा वतन इतिहास है यह कह रहा स्वतंत्रता जय मान की धरा ये विश्वेश है। तीर्थों का तीर्थ देश है कोटि आदर्श भेस है स्वतंत्रता के कंठ से कर रहे जय नाद हैं समता के संवाद का ना कोई व्यवधान है धरा ये विश्वेश है। परिचय :- डाँ. बबिता सिंह निवासी : हाजीपुर वैशाली (बिहार) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के ...