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Tag: पुष्पा खंगारोत

कर्मो का फल
कविता

कर्मो का फल

पुष्पा खंगारोत जयपुर (राजस्थान) ******************** ये वक़्त का फेर कहो या कर्मो की गाथा क्योंकि, जब समय है आता तो ईश्वर भी नही बच पाता।। ना राजा दशरथ कर्मो के फल वश बाण चलाता, ना मंथरा विष की वाणी घोलती ना केकई राम को वन का मार्ग दिखाती।। ना युद्ध में कृष्ण ने छल किया होता ना माँ गांधारी को क्रोध आता, ना श्राप वश ईश्वर होने पर भी मानव मृत्यु का दंश मिलता।। ना भीष्म से नारी का अपमान होता ना अंबा ने श्रीखंडी का रूप मांगा होता, ना अर्जुन ने उनकी ओट ली होती ना भीष्म को बाणो की शय्या मिलती।। ना पिता की मृत्यु पर अस्वथामा ने क्रोध किया होता ना पांडवो के वंश को निंद्रा मे चिर निंद्रा देते, ना ज़ख़मो मे रिस्ते खून के संग चिरंजीवी होके अकेले वनों मे भटकने का श्राप मिलता।। परिचय : पुष्पा खंगारोत निवासी : जयपुर (राजस्थान) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाण...
मुझे मेरा गाँव याद आता है
कविता

मुझे मेरा गाँव याद आता है

पुष्पा खंगारोत जयपुर (राजस्थान) ******************** मुझे मेरा गाँव याद आता है वह बचपन याद आता है, जब तितलियों से उड़ते फिरते थे, वह मौसम याद आता है।। ना कोई रोक थी ना कोई टोक थी, हर लम्हा हम खुद मे जिया करते थे, याद आता है वो बचपन जब हम गाँव मे रहते थे।। ना किसी कदम पर कोई खतरा था ना माँ की आँखों का पहरा था, ना बाबा परछाई से घुमा करते थे ना कलाई पर भाई की पकड़ थी याद आता है वह बचपन...।। याद आती हैं वो गलियां जिनमे बचपन फूलों सा खिलता था हर नजर मे हमारा एक अपना सा रिश्ता हुआ करता था, कोई हमे बहन तो कोई बिटिया कहा करता था।। याद आता है वो...।। बदल गया मेरा गाँव अब तो लोग भी बेगाने लगते है, कोई दो कदम साथ भी चले तो हम घबराने से लगते है।। कोई अगर पूकार भी ले हमे तो हम घबराने लगते है।। याद आता है मेरा गाँव...।। परिचय : पुष्पा खंगारोत निवासी : ...
हाले बया खुद से खुद की जंग
कविता

हाले बया खुद से खुद की जंग

पुष्पा खंगारोत जयपुर (राजस्थान) ******************** अब डर नहीं लगता मौत से, मैंने जिन्दगी को बहुत करीब से देखा है। के डर नही लगता किसी को खोने का, मैंने खुद को करीब से खोते हुए देखा है।। के बिखरी हूँ टूटी हूँ, खुद को बहुत समेटा है। के अब चाहत ही खत्म हो गई खुद से खुद की, मैंने खुद को खोते हुए देखा है।। के लुटे हुए मंदिरों की सूनी दहलीज देखी है, देखा है बिखरना मजारो का, सूनी मांग देखी है।। क्या कहूं अब किसी बात का खोफ मुझे नही सताता, हर रोज बिगडती हूँ , पर अब मुझे खुद का हाल बताना रास नही आता, के नही लगता अब इस दुनिया में कोई अपना सा मुझे, क्यों के इस अपनेपन को मैंने बेगानों के रूप में देखा है।। के अब डर नही लगता मौत से, मैंने जिन्दगी को करीब से जाते देखा है।। परिचय : पुष्पा खंगारोत निवासी : जयपुर (राजस्थान) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित क...
बातें अनछुई
कविता

बातें अनछुई

पुष्पा खंगारोत जयपुर (राजस्थान) ******************** कुछ बातें अनछुई सी रह जाती है बात जब जज्बातों की आती है, क्या ही कहिये बातों का होना यहाँ फसानो सी जब जिंदगी हुई जाती है, रहा होगा वक्त कभी किसी जमाने में लोगो के पास एक दूजे के लिए आज तो मशीनों से बत्तर जिंदगी होती है, कभी ख्वाब आंखों में सजा करते थे आज तो नींद भी बहुत दूर रहती है, अजीब कशमकश में ढल जाती है जिंदगी न पत्थर सी है न पत्थर से कम लगती जाती है जिंदगी, कुछ बातें अनछुई रह जाती है ना भुलाई जाती है ना जहन से जाती है ll परिचय : पुष्पा खंगारोत निवासी : जयपुर (राजस्थान) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है।...