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Tag: आनंद कुमार पांडेय

कविता

ये जनम-जनम का नाता है

आनंद कुमार पांडेय बलिया (उत्तर प्रदेश) ******************** इतना भी दूर नहीं है माँ, क्यों लाल मेरे चिल्लाता है। तेरे और मेरे बीच सुनो, ये जनम-जनम का नाता है।। तुझको हर वो कुछ देती हूँ, जो तेरे मन को भा जाये। कोई भी वस्तु नहीं जग में, जो तेरे जी को ललचाये।। तु मेरा राजा बेटा है, ये बात गवारा मत समझो। अब तुझे बताना होगा हमें, क्या तेरा नेक इरादा है।। इतना भी दूर नहीं है माँ, क्यों लाल मेरे चिल्लाता है। तेरे और मेरे बीच सुनो, ये जनम-जनम का नाता है।। है मेरे आँख का तारा तु, जीवन का एक सहारा तु। है अरमानों की बगिया का, इक अदभूत सुमन हमारा तु।। अपनी माँ की इस ममता पर, कभी प्रश्न खड़ा न कर देना। मेरे जीवन को लाल मेरे, आनंद ज्योति से भर देना।। जीवन की हर कठिनाई को, तुझे कोसो दूर भगाना है। हंसते-हंसते हीं जीना है, हंसते-हंसते मर जाना है।। इतना भी दूर ...
कविता

सपने संगम जैसे

आनंद कुमार पांडेय बलिया (उत्तर प्रदेश) ******************** सपने संगम जैसे लगते, दूर हमारे दुखड़े भगते। छु हीं लेंगे अपनी मंजिल, विघ्नों से ना पीछे हटते।। सपने संगम जैसे लगते, दूर हमारे दुखड़े भगते।। जीवन के हर विकट समय को, हंसते-हंसते दूर भगाना। हम भी हैं इक अद्भूत मानव, सपना आया एक सुहाना।। हम हैं निडर पथिक उस पथ के, पार करेंगे हम भी डटके। सपने संगम जैसे लगते, दूर हमारे दुखड़े भगते।। कभी पंख लग जाते हमको, पक्षी बन उड़ जाते हैं। आसमान के खुले सफर में, उड़ने में सुख पाते हैं।। इन विचित्र सपनो की दुनिया, में हम कभी नहीं हैं थकते। सपने संगम जैसे लगते, दूर हमारे दुखड़े भगते।। वो बचपन के सपने भी तो, आ जाते हैं कभी-कभी। खेल-खेल में रोज झगड़ना, फिर मिल जाना अपना भी।। सपनो के इस सुंदर वन में, मन आनंद के रोज भटकते। सपने संगम जैसे लगते, दूर हमारे दुखड़े भगते।...