जिनगी के रद्दा
खुमान सिंह भाट
रमतरा, बालोद, (छत्तीसगढ़)
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(छत्तीसगढ़ी - गीत)12
वो दिन बढ़ सुघ्घर हो जाथे,
दाई के भुवना म जोत जंवारा लहराथे,
चैत के महीना खुशहाली के नवा बिहान लाथे,
फेर नवा बछर के अंजोर बगराही कोन?
मोर जिनगी के रद्दा बताही कोन?
महिना बैसाख के हमाथे।
अक्ति के भंवर लइका मन
पुतरी पुतरा के परवाथे,
ऐसो के लगिन म मोरो लग जातिस,
दाई अपन मन के बात बताते,
कैसे समझावव मैं तोला वो दाई,
बिना रोजगार मोला,
अपन बेटी के हाथ धराही कोन?
मोर जिनगी के रद्दा दिखही कोन?
मुंधेरहा के घाम
मंझनिया कस जनाथे,
सुरुज नारायण तरवा म चढ़ जाथे,
जब महिना जेठ के आते,
जरत भोंभरा तीपत हे छानी,
बूंद-बूंद पानी बर तरसत परानी,
जल बिन सुन्ना हमर जिगानी,
फेर जल संरक्षण में
महत्तम ला बताही कोन ?
मोर जिनगी के रद्दा दिखही कोन?
पियासे भुंईया के जी जुड़ाथे
जब महीना आषाढ़ संग बरखा आते,
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