पंथी पंथ निहार लें
डॉ. भगवान सहाय मीना
जयपुर, (राजस्थान)
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पंथी पंथ निहार लें, कर ईश्वर का ध्यान।
नश्वर है संसार तो, सच को ले पहचान।
शब्दों से होता नहीं, भावों का अनुवाद।
भाव बसे हैं हृदय में, शब्द करें संवाद।
हरित चूनरी ओढ़कर, धरा करें श्रृंगार।
मेघ मल्लिका रूपसी, सजती सौ सौ बार।
विडम्बना है देश की, न्याय हो रहा जीर्ण।
अदालत लाचार हुई, रहें कैसे अजीर्ण।
हाड़ कॅंपाती ठंड है, पाला पड़ा तुषार।
फसलें सारी जल गई, शीतलहर संचार।
भूखे पापी पेट का, करतें रोज जुगाड़।
रोजगार के नाम से, तिल का बनता ताड़।
मानव तेरी जाति का, कैसे हो उत्थान।
काम क्रोध मद लोभ में, लुप्त हुई पहचान।
धीरे- धीरे चली वधु, वरमाला कर थाम।
दुल्हा तोरणद्वार में, जोडी सीता राम।
भाव- भावना से भजो, हो जाओ भव पार।
योग भोग सब छोड़ के, हृदय बसाए राम।
कोरोना के कहर से, बेबस हुआं इंसान।
आज प्...

