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Tag: डॉ. भगवान सहाय मीना

२ जून की रोटी
कविता

२ जून की रोटी

डॉ. भगवान सहाय मीना जयपुर, (राजस्थान) ******************** मैं बेच देता हूं अपना ईमान, अपना सत्य, नैतिकता और खुद को भी...!! मैं पशु, पक्षी, जानवर नहीं, इंसान हूं, केवल इंसान ! दो जून की रोटी के खातिर ?? नीचता कि हद तक गिरकर... मैं बेच देता हूं, अपना अस्तित्व।। परिचय :- डॉ. भगवान सहाय मीना (वरिष्ठ अध्यापक राजस्थान सरकार) निवासी : बाड़ा पदम पुरा, जयपुर, राजस्थान घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...🙏🏻😊💐💐💐 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी रचनाएँ प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख हिंदी में टाईप करके हमें hindirakshak17@gmail.com पर अणु डाक (मेल) कीजिये, अणु डाक करने के बाद हमे हमारे नंबर 98273 6036...
पिता
कविता

पिता

डॉ. भगवान सहाय मीना जयपुर, (राजस्थान) ******************** पापा मैं ढूंढता हूं, दिन-रात पिता के पर्याय... शब्दकोशों में, पांडुलिपियों में, और दुनियाभर के ग्रन्थों में। लेकिन आज तक रत्तीभर भी, नहीं मिला पिता के समकक्ष। पिता की अद्भुत कहानी, सुशोभित है छंद अलंकारों से। कठिन है इसकी परिभाषा। परिवार और संतान के लिए, सर्वस्व त्याग कर्ता संन्यासी, कौन है बड़ा इस बैरागी से। असंख्य दुखों का भार, पिता कैसे सह लेते है। क्यों नहीं टूटकर बिखरते है ? कैसे दबा लेते है बेबसी, झलकती नहीं शिकन तक, अपने को वज्र कैसे बना लेते है। हर घर में निश्चित है कोना, जहां दुनिया-भर के सभी पिता, बरसकर "जी" हल्का कर लेते है। जिससे उनमें आ जाती है, लड़ने की हिमगिरि सी अटलता, और पुरुष का कवच धर लेते है। समाज की रीति-नीति से, लौह आवरण चढ़ा है, उनकी मोम सी आत्मा पर। सिसकती अधूरी ...
किताबों के साथ
कविता

किताबों के साथ

डॉ. भगवान सहाय मीना जयपुर, (राजस्थान) ******************** क्या आप जानते है चिंता को, और पहचानते हो तनाव को। जीवन में अनुभव किये होंगे, पीड़ा, बेबसी और मजबूरी को। डर, घबराहट और परेशानियां, जगाये रखती होगी देर रात को। कल की चिंता, व्याकुलता, भय, आंखों से दूर रखती है निंद को। सफल नहीं हुआ तो क्या होगा, कब दूर करूंगा बेरोजगारी को। लाखों कठिनाइयां है रास्तें में कैसे संभाल पाऊंगा जिंदगी को। पुस्तकालय में दत्तचित्त होकर, हराते है कितने ही विचारों को। युवा किताबों के साथ पढ़ते है, घर के विखंडित हालातों को। उन्हें याद है पिता के सिर चढ़ा, कर्ज और साहूकार का तकाजा। ज्ञात है ब्याज की चक्रवृद्धि दर, क्योंकि दुनिया में दौलत से ही, परिभाषित है रंक और राजा। प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी में, हताशा से गहराई तक टूट जाते है। आखिरी सीढ़ी तक पहुंचकर, बिना मंजिल के फ...
चंद उदासियां
कविता

चंद उदासियां

डॉ. भगवान सहाय मीना जयपुर, (राजस्थान) ******************** बैठ जाता है इंसान शाम को, छत पर चंद उदासियों के साथ। समय और भाग्य कोसने को, हालात की सिसकियों के साथ। विचारों के घोर द्वन्द में उलझा, ओढ़े हुएं आशंका की कालिमा। अंधेरे की टीस में देखता नहीं, वह डूबते सूरज की लालिमा। कल की फिक्र में आज विकल, जबकी "कल किसने देखा" है। दिशा और दशा पलटती पल में, बहती हवा कान में समझाती है। जब हमारी चाहत के मुताबिक, यह ज़िंदगी थोड़ा मचलती नहीं। हो जाता है मन बड़ा दुखी जब, बेलगाम ख्वाहिशें मुस्कराती नहीं। रास्ता जारी हर दिन प्रयास कर, कुंदन निखरता है दहकने पर। लौटती है शाखाओं पर खुशबू, पतझड़ की जद से निकलने पर। परिचय :- डॉ. भगवान सहाय मीना (वरिष्ठ अध्यापक राजस्थान सरकार) निवासी : बाड़ा पदम पुरा, जयपुर, राजस्थान घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार ...
होली तेरे रंग
कविता

होली तेरे रंग

डॉ. भगवान सहाय मीना जयपुर, (राजस्थान) ******************** फीके-फीके अब लगे, होली तेरे रंग। क्यूं बेसुरे से हो गये, फागुन वाले चंग। बहुरंगी दुनिया में, शेष ना असली रंग, ढ़ोल नगाड़े प्रेम के, बजते नहीं मृदंग। खास वर्जित है, आकर दबे पाँव लगाना, गुलाल गजबन गालों पे, नहीं सुहाती अंग। फागुन में धूमिल पड़ी, रसिया वाली रात, गुलमोहर की डाल पर, बसंत नंग-धड़ंग। बदले बदले मौसम में, दुखी खड़ा पलाश, फागुन अब नहीं खेलता, रंग रंगीला फाग। रिश्तों में से गायब है, चंदन की सी महक, चौपालों पर बस्ती में, बजती नहीं भपंग। लाती नहीं कुमारियां, अब गेहूँ चने की बाल, कच्चे पक्के मासूमों को, देख बिड़कुल्ले दंग। पीलिया ग्रसित ठिठोली, मन में मीठी आग, प्रीत प्रेत सी देखकर, भौचक धुरखेल के रंग। परिचय :- डॉ. भगवान सहाय मीना (वरिष्ठ अध्यापक राजस्थान सरकार) निवासी : बाड़ा पदम पुरा,...
नववर्ष
कविता

नववर्ष

डॉ. भगवान सहाय मीना जयपुर, (राजस्थान) ******************** नववर्ष जगा देगा फिर से, जीवन में टूटी उम्मीदों को। वादा कर लेगा हताशा से, व्यक्ति सपने पूरे करने को। प्रफुल्लित होगी मन मयूरी, रंग चढ़ेगा आशा किरणों को। पल्लवित होगा हृदय चमन, यूं हौसला मिलेगा कदमों को। फिर जज्बा जगेगा अंतस में, कर्मठ बांध लेगा मुट्ठियों को। आस को परवाज मिलेंगे फिर, कसूमल रंग नव खुशियों को। सुदूर क्षितिज से राह मिलेगी, कमर कसे चल पड़ेंगे लक्ष्य को। अब सुलझेंगी उलझी गुत्थी, नवल उमंग मिलेगी कर्मों को। जोश जुनून उम्मीद उत्साह, पुनर्जीवित हुये सब नव वर्ष को। सुखी जीवन वेदना होगी दूर, परिचय :- डॉ. भगवान सहाय मीना (वरिष्ठ अध्यापक राजस्थान सरकार) निवासी : बाड़ा पदम पुरा, जयपुर, राजस्थान घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है...
नदी फिर से बहना
कविता

नदी फिर से बहना

डॉ. भगवान सहाय मीना जयपुर, (राजस्थान) ******************** कलम बोलती कागज से, आओ मन की कह दूं। झूठे जग के चलचित्रों में, सत् के रंग बतला दूं। सूख गया रिश्तों का सागर, संबंधो में थार मरूस्थल। स्वार्थ के वशीभूत जगत है, बहरूपिया सा अंतस्थल। ज़र जोरू जमीन खास है, रत्तीभर स्नेह कहां सहोदर में। शुष्क लुप्त है आत्मियता, रिसती दरार गहरी आंगन में। बोल चाल बंद अपनों से, कुंठित गैरों से भ्रमित हुए। दूध में तलवार चलती, संस्कार सब धूमिल हुए। वात्सल्य शल्य से ग्रसित, रोये अपनापन संन्यास लिए। मात-पिता में अनबन बडी, बच्चें पढ़ने को वनवास लिए। पति पत्नी के गठबंधन में, निरस गाँठों की भरमार घनी। अलगाव विखंडित मोहब्बत, झूठी शान जिए प्रणय के धनी। कब समरसता को सीखेंगे, अपनेपन में कटे कटे से रहना। यूं विस्तापित जग जीवन में, ममता की नदी फिर से बहना। परिचय :- डॉ...
विजयादशमी
कविता

विजयादशमी

डॉ. भगवान सहाय मीना जयपुर, (राजस्थान) ******************** मेरे लंका रूपी मन के, विषय विकारी रावण को। आप जीतने आना प्रभु, आश्विन शुक्ल दशमी को। अन्तर्मन में दीप जला, सत्य विजयभव कहने को। आना सद् चरित्र करने, मैं आहुत करूं दशहरे को। असुरों सा संहार करें, काम,क्रोध,मद, लोभ को। वंचक कपटी मन से, प्रभु दूर करें मनोरोग को। धर्म पथिक रहूं सदा, नमन सीता के सम्मान को। कलयुग का केवट करता, नित वंदन श्रीराम को। असत्य पर सत्य की जीत, दोहराना इतिहास को। कलयुग कर दो त्रेता को, अवध मेरे हिंदुस्तान को। हर घर याद दिला दो, इंसा भूल गए भगवान को। मन मंदिर में मानव देखो, क्यूं पूजता लंकेश को। परिचय :- डॉ. भगवान सहाय मीना (वरिष्ठ अध्यापक राजस्थान सरकार) निवासी : बाड़ा पदम पुरा, जयपुर, राजस्थान घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रच...
गुरु महिमा (दोहे)
दोहा

गुरु महिमा (दोहे)

डॉ. भगवान सहाय मीना जयपुर, (राजस्थान) ******************** गुरु ओजस्वी दीप है, तेज है चहुं ओर। अपने अनगढ़ शिष्य का, सृजन करें हर छौर। विद्यास्थली मंदिर है, गुरु मेरे भगवान। करता नित मैं वंदना, हृदय बसे सम्मान। अभिनन्दन गुरु देव का, है सादर सत्कार। अनुग्रह मिलें शिष्य को, करते नित उपकार। नित गुरु शिष्य भला करे, नव चरित्र सृजनकार। संस्कार की विशेषता, नव वृत्तिक मूर्तिकार। गुरु विशेष की खान है, गुरु कोमल अहसास। गुरु अज्ञान विनाशक है, गुरु नायक विश्वास। गुरु संस्कृति की रोशनी, गुरु विशेषण विशाल। सद् गुरु सा सगा नहीं, गुरु अनमोल मिशाल। गुरु सहज सरल जीवनी, गुरु जग तारणहार। गुरु संबल है शिष्य के, गुरु नव पालनहार। गुरु वितान नव ज्ञान के, गुरु पावन परिवेश। गुरु ओज चरित्र भव्य है, आप मूर्ति अनिमेश। परिचय :- डॉ. भगवान सहाय मीना (वरिष्ठ अध्यापक राजस्थान सरकार...
जंगल हर दिन रोता है
कविता

जंगल हर दिन रोता है

डॉ. भगवान सहाय मीना जयपुर, (राजस्थान) ******************** एक दिन मैं गुजर रहा था, शाहाबाद के जंगल से। पहाड़ों को काटकर बनाई गई, खुबसूरत डामर की सड़क पर। अद्भुत मनोहर कांतार, पर्वत के शिखर से तलहटी तक सघन आच्छादित सुरम्य। नदी, झरने, घाटी, जलाशय से भरा पूरा परिवार। असंख्य जीव,जन्तु,पशु,पक्षी, भ्रमर, तितलियाँ, फूल,फल, चारों दिशाओं में व्यापक विस्तार। मुझे देखकर सिसकने लगे पेड़, महुआ, पलास, शीशम, छिला। दहाड़े मारने लगे शमी,नीम और कानन के सब पहरेदार। असीम अरण्य रुदन सुनकर मैं भयग्रस्त कम्पित हृदय से विनीत स्वर में पूछा.. हे! विपिन क्या, कोई प्रलय का आभास हुआ या दावानल कही जल उठी। बियाबान में क्रंदन कैसा..? क्यों कोमल किसलय रो उठी। यह सुनकर मेरी मीठी बात, कुछ धीरज धरकर चुप हो फिर अटवी बोला मेरे से, ना प्रलय का आभास हुआ ना दावानल से डरता मैं। मेरे कंद,मूल,...
सावन
दोहा

सावन

डॉ. भगवान सहाय मीना जयपुर, (राजस्थान) ******************** सावन उमड़ी बादली, बरस रही घनघोर। कोयल कजरी गा रही, नाच रहे वन मोर। रिमझिम पड़ी फुहार से, हुई सुनहरी भोर। खुशियों की बरसात में, हलधर करता शोर। तीज त्यौहार बादली, सावन की बरसात। मेघ चमकती बीजुरी, हरित अमावस रात। काली घटा गगन चढ़ी, गरज गरज कर घोर। सतरंगी सा लहरिया, इंद्र धनुष का छोर। मेघ मल्लिका रूपसी, सजती सौ सौ बार। हरी चुनरिया ओढ़कर, धरा करे श्रृंगार। चातक श्यामा झूलते, मदन तरु की शाख। मीठी टेर दादुर की, पपिया प्यारी वाख। मादक यौवन हरितिमा, निर्मल बहता नीर। हुआ सुगंधित मलयगिरि, शीतल मंद समीर। परिचय :- डॉ. भगवान सहाय मीना (वरिष्ठ अध्यापक राजस्थान सरकार) निवासी : बाड़ा पदम पुरा, जयपुर, राजस्थान घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। ...
बिखर गए सांसों के मोती
कविता

बिखर गए सांसों के मोती

डॉ. भगवान सहाय मीना जयपुर, (राजस्थान) ******************** शब्द श्रद्धांजलि : मृतक बच्चें (हादसा - पीपलोदी शाला, झालावाड़) बिलख रहे बापू जिनके, वो छोड़ गए मां को रोती। टूट गई जीवन की माला, बिखर गए सांसों के मोती। पोथी बस्ता अनाथ हुए, और कलम रह गई सोती। तम के गहरे आघातों से, बुझ गई जीवन ज्योति। मृत्यु बड़ी निर्दय हुई, बाल-सभा को खाती। वीभत्स दृश्य चीत्कार देख, हर आंख आँसू बहाती। मौत भी मजबूर हो, जिस गुलशन को आती। बरसों से क्यों पाले थे, फिर मरघट की सी थाती। क्या आंखो से अंधे थे, अथवा गांधारी की जाति। दिखी नहीं सर्पणी जिनको, मासूमियत को डसती। तुम शीशमहल में रहते हो, क्यों कच्चे हमको पाती। कौन जिम्मेदार बुझाने को, बच्चों की जीवन बाती। परिचय :- डॉ. भगवान सहाय मीना (वरिष्ठ अध्यापक राजस्थान सरकार) निवासी : बाड़ा पदम पुरा, जयपुर, राजस्थान घोषणा पत...
छोटू
कविता

छोटू

डॉ. भगवान सहाय मीना जयपुर, (राजस्थान) ******************** छोटू चाय लाना..!! यह कितनी सामान्य सी पुकार है। थडी, ढाबा, कैफे, रेस्टोरेंट, बस, ट्रेन आदि, सब जगह मौजूद है छोटू। गंदी मैली सी धारीदार कमीज, मोटे धागे से सिली हुई फटी पेंट काली हवाई चप्पल पहने हुए। सिर के रुखे उलझे बिखरे बाल, मुख मलिन आंखों में चमक लिए। सूरज की पहली किरण के साथ दौड पडता है छोटू दूर तक, चाय गर्म, समोसे गर्म लिए। सरकार, मैं और आप नहीं जानते उसका छोटू बनने का कारण ? बनी होगी चक्र व्यूह सी कठोर विपरीत परिस्थितियाँ। मजबूरी ही बनाती हर बालक को अभिमन्यु और छोटू। जहां लडता है वह योद्धा बन, घर परिवार जीवन बचाने के लिए। वो अपना अजीज खोकर आया होगा यहां छोटू बनने। मां, बाबूजी या दोनों को ही, जिंदगी की अनाथ पगडंडियों पर। आती होगी याद उसे अपनों की, सिसकियाँ भरता होगा अकेले में। थक हारकर जब दे...
मेंढक कब बोलेंगे
कविता

मेंढक कब बोलेंगे

डॉ. भगवान सहाय मीना जयपुर, (राजस्थान) ******************** असीम संभावना का धनी आषाढ गर्मी से बेहाल, सूखे होंठ उदास बैठा है खेत की मुंडेर पर। मुंह मोड़े तीतर पंखी बादली, अलनीनो के प्रेम से बदहवास फिरती दूर गगन के छोर पर। किसान तीर्थ कर आया अलसुबह, खेत सी धरा पावन कही नहीं। मेहनतकश पसीने से, इस रज का कण कण सिंचित है। दंडवत कर निहार थे कुएं की गहराई को, गहरी वेदना से। पानी उतर गया था जिसका, पाताल में अश्विन की बादली सा। आते हुए गांव के पलसे में, नज़र ठिठकी तालाब पर चौतरफ किनारे की हरी भरी दूब सूख गई थी, महाजन की आत्मा सी। जो ठिठहरी सा चीक-चीक करता है दिनभर। जौंक सा तालाब के बाहर, निर्मम चूस रहा है सदियों से। पोखर में नहीं बचा था पानी जिसमें तैर सके कछुए और मछलियाँ, नहा सके छलांग लगाकर नंगदडंग बच्चे। औरतें पिला सके गुनगुनाती हुई गाय, भैंस, बकरियों को...
होली के रंग
कविता

होली के रंग

डॉ. भगवान सहाय मीना जयपुर, (राजस्थान) ******************** याद आते है, मुझे होली के रंग। मतलबी दुनिया में, इंसान हुए बेरंग। स्वार्थवश गूंगी हुई, भाई चारे की चंग। रंग बदलते लोगों से, अचरज में सब रंग। देख नशा इंसान का, ठगी गई है भंग। उतरे रंग को देखकर, गुलाल रह गई दंग। कंठ कंठ में बजते, कड़वे भावों के मृदंग। ऊसर सब की वाणी, प्रेम वात्सल्य में जंग। भौतिक सुखी अंतर्मन, ठूंठ सरीखे नंग। गांव मौहल्ले भी, लगते शहर से बदरंग। परिचय :- डॉ. भगवान सहाय मीना (वरिष्ठ अध्यापक राजस्थान सरकार) निवासी : बाड़ा पदम पुरा, जयपुर, राजस्थान घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, ...
नव वर्ष
दोहा

नव वर्ष

डॉ. भगवान सहाय मीना जयपुर, (राजस्थान) ******************** केसर रोली अक्षत से, सजा लिया है थाल। तिलक करूं में हर्ष से, नये साल के भाल। अभिनंदन नव वर्ष का, नव उमंग के साथ। ले नया संकल्प सभी, आज उठा कर हाथ। स्वर्णिम उषा की किरणें, चमक रही है लाल। मंगल गायन हो रहे, देख शुभ घड़ी शुभ साल। नव किरण नव उजास से, पोषित हो नव भोर। जीव जगत आनंद मय, हर्षित हो चहुंओर। जीवन में यश खुब मिलें, मंगल मय अति हर्ष। मन आंगन में सब करें, अभिनंदन नव वर्ष। परिचय :- डॉ. भगवान सहाय मीना (वरिष्ठ अध्यापक राजस्थान सरकार) निवासी : बाड़ा पदम पुरा, जयपुर, राजस्थान घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के सा...
मुलाकात अपने आप से
कविता

मुलाकात अपने आप से

डॉ. भगवान सहाय मीना जयपुर, (राजस्थान) ******************** मैं सोचता हूँ, कभी मुलाकात कर लूँ अपने आप से। पकड़ लूँ गिरेबान और मिला लूँ आंखे अपने अहम से। मैं हूं बड़ा बदतमीजी, कूट-कूट कर भरा है अभिमान मुझ में। बस पहचान का फितूर चढ़ा है खाली दिमाग में। ईर्ष्या द्वेष द्वन्द्व जैसे साथी संग खड़े हैं मन के मरुस्थल में। है विडम्बना कैसी, मेरे मन से कम खारापन सागर में। मैं अपनी बतला दूं, नैतिकता कहीं दूर खड़ी भाव-भावना बिखरी सी। गुण पर भारी अवगुण, दग्ध हृदय संताप भरा जीवन लीला घिरणी सी। खंडित आभासी वैभव, मोह माया संलिप्त दम्भ में ऐंठे रहता हूं। लघुतर मानू और को, मैं मगरूर आत्मश्लघा अहं में डूबा रहता हूं। मैं सोचता हूँ, कभी मुलाकात कर लूँ अपने आप से। पकड़ लूँ गिरेबान और मिला लूँ आँखें अपने आप से। परिचय :- डॉ. भगवान सहाय मीना (वरिष्ठ अध्यापक राजस्थान स...
औरत नदी होती है
कविता

औरत नदी होती है

डॉ. भगवान सहाय मीना जयपुर, (राजस्थान) ******************** औरत नदी होती है, जो बहती रहती है। वात्सल्य से पूरित, स्नेह में परिपूर्ण हो। पहाड़ों से ढलानों में, घाटियों से मैदानों में। असंख्य पत्थरों को, भावों से ठेलती हुई। पिता से पति तक, उतार चढ़ावों से गुजरती पहुंचती है ज्वार भाटे सी, सागर तक बहती हुई। बचपन की वर्जनाएं वह भूलती नहीं है। "शोभा नहीं देती तेरी यह मुंह फाड़ू हंसी", अगले घर जायेगी, तू लड़की है। बालपन से किशोरी होने तक, कितनी ही बार सुनती है। अदब से रहना सीख ले, तेरे संग बंधी है घर की इज्जत। जैसे यह घर उसका नहीं, पिता का घर, माता का घर, जहां उसका जन्म हुआ, वो उसका ठिकाना नहीं है। समझती है वो सत्य को, वो तो सृष्टि की सृजक है, उसे तो पराएं घर जाना है। पहाड़ों से जंगलों में बहकर, मिलना है सागर के खारेपन में। खपाकर जीवन को फिर से, वाष्प बनकर...
टूटते परिवार
कविता

टूटते परिवार

डॉ. भगवान सहाय मीना जयपुर, (राजस्थान) ******************** तोड़कर बांध, पानी निकल पड़ा है बस्तियां डूबोने को। कोशिश तो करों, डालकर पाल पे मिट्टी रिश्ते बचाने को। सिसक रहे आंगन, कहीं ख़ून से तर दामन स्वार्थ भूख मिटाने को। पंख काटने बैठे दर पर, सावधान अपनों से रहना खाएं बाड़ खेत को। रिश्तों के पैमाने, बदल गये जग में कंठ लगाकर दौलत को। टूटते परिवार, भाई बांधव भूलकर खास बना ली शौहरत को। परिचय :- डॉ. भगवान सहाय मीना (वरिष्ठ अध्यापक राजस्थान सरकार) निवासी : बाड़ा पदम पुरा, जयपुर, राजस्थान घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर ...
सावन
कविता

सावन

डॉ. भगवान सहाय मीना जयपुर, (राजस्थान) ******************** मेघ आच्छादित नभ क्षितिज तक, झर- झर बरसती काली घटाएं, मन विकल करती शीतल बूंदें, हिय को झकझोरती चंचल पुरवाई। यह सावन भी बड़ा बेदर्दी है, खेलता है कभी पलकों से, अल्हड़ फुहारें जला देती है तन से मन तक उदासी की अगन। भरी बरसात में दहन उठता है अलाव उनकी यादों का, नीम की डाल पर तड़प रहा है झूला आंगन में, मेरे साजन का। हुई थी बात कल रात सैनिक से, बाढ़ राहत शिविर में लगा हूं, बोलें थे बड़े रुआंसे होकर... यह सावन बड़ा बेइमान है। बरसते हैं बादल जी भरकर, प्रति वर्ष सजीले सावन में, बहती है यौवन से परिपूर्ण नदी, लेकिन मिटती नहीं मन की प्यास। अधूरी रह गई गत वर्ष की भांति, इस वर्ष भी चाह झूला झूलने की चल पड़ी गांव के पोखर पर चादर, आत्मा फिर भी प्यासी की प्यासी। परिचय :- डॉ. भगवान सहाय मीना (वरिष्ठ अध्य...
राखी
कविता

राखी

डॉ. भगवान सहाय मीना जयपुर, (राजस्थान) ******************** आषाढ़ की बादली, सावन की रिमझिम सी, नेह सिंचित राखी लिए, बहिन छबीली आई। चमकीली रेशम की डोरी, भाव जड़ी माणिक, वात्सल्य की बहती गंगा, रिश्तों के सागर आई। भाई बहिन के प्रेम की, नन्हीं राखी प्रति छाया, अमर आत्मिक गाथा, सुख-दुःख की यह पुरवाई। संकट से जब घिरी बहिन, तो भाई बना रक्षक, आन पड़ी जब भ्राता पर, बहिन फ़र्ज़ निभाई। खुशियों की सौगात, अपनों की मिठास राखी, अटूट बंधन नेह समरस, वचन मोली कहलाईं। पंख पैर में लगा आत्मजा, बाबुल के घर पहुंचे, भर - भर आंगन निरखती, प्रीत नैहर की पाई। परिचय :- डॉ. भगवान सहाय मीना (वरिष्ठ अध्यापक राजस्थान सरकार) निवासी : बाड़ा पदम पुरा, जयपुर, राजस्थान घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भ...
बेटी की विदाई
कविता

बेटी की विदाई

डॉ. भगवान सहाय मीना जयपुर, (राजस्थान) ******************** लड़वण प्यारी लाड़ली, निरख रही घर आंगन को। प्रणय विदा की वेला में, ढांढस बंधातीं बाबुल को। मां कैसे घर को भूलूंगी, और कैसे तेरे आंचल को। अनुज अंक में बिलखती, छाती भर कर भाभी को। विकल हृदय मयूरी सी, तोड़े अंसुवन बांधों को। क्रंदन करती याद में, रह रह आती यादों को। भरी अंजुरी अक्षत ले, बैठी देहरी पूजन को। झर- झर बरसी आंखें, नयन लजाते सावन को। मां भूल मत जाना प्रातः, पानी अर्पण तुलसी को। बिखेर देना छत पर, मुठ्ठी भर दाना चिड़िया को। मां दवा समय पर लेना, बस स्वस्थ रखना खुद को। भूल जाएं कोई काम धाम, तो लड़ना मत पापा को। भाभी मेरी ख़ास सहेली, संग रखना याद भूलाने को। कभी डांटना मत गुस्से से, बिगड़ा काम सिखाने को। भाभी खुशियों की चादर में, तू बांधे रखना सब को। अब अपना करने मैं चली, किसी ...
पिता
कविता

पिता

डॉ. भगवान सहाय मीना जयपुर, (राजस्थान) ******************** पापा बताओं ना, कुछ पिता के बारे में। कोई छंद राग, अपनी कहानी के बारे में। क्या आपके पापा भी करते थे, इतना ही प्यार जितना, भर छाती आप उड़ेलते हो दोनों हाथों से। क्या उनके भी रहती थी, शिकन माथे पर और झलकती थी, चिंता आंखों से। ठगी गई थी अल्हड़ जवानी उनकी भी, ऐसे ही अबोध बच्चों के लिए। अधूरे लगते थे आंखों के सपने, घर परिवार अपनों के लिए। उनकी भी अथक भाग-दौड़, जीजिविषा और संघर्ष मय, कसक भरी कहानी रही होगी। हृदय के किसी कोने में, कुछ बचपन की, कुछ जवानी की इच्छाएं सिसकियां भरी होगी। चाहे होंगे आपके पापा भी, आपकी तरह दुनिया की हर खुशी, अपनों के दामन में महका देना। उनके कंधे भी झुकें होंगे हमेशा, ज़िम्मेदारियों से बोझिल हो, खुशियों को सहारा देना। उनकी भी मुस्कराहटों में, साफ़ झलकती होगी कसक, बड...
जिंदगी खंडहरों में
कविता

जिंदगी खंडहरों में

डॉ. भगवान सहाय मीना जयपुर, (राजस्थान) ******************** बिखरी हुई छोटी-छोटी खुशियों को, नजरंदाज करके, उलझी पड़ी है जिंदगी खंडहरों में। बेलगाम इच्छाएं, मुंह बाए खड़ी मौत सी, पाने की जद्दोजहद तिल तिल तनाव में। परिवार समाज को छोड़कर, अपनी नज़र से कभी खुद को देखो, तुम खुद पर फ़िदा हो जाओगे। धूल जम गई है हजारों सपनों पर, उन सपनों को बुनने लग जाओगे। एक बार फिर से सुन लिजिए, ध्यान मग्न मुनियों से, भर यौवन बहती नदी की कल-कल को। खिल उठोगे अबोध बालक से, चिंता को किनारे लगा, क्षण भर निहारे खिलते फूलों को। तितली के सुनहरे पंखों सी जिंदगी, गुनगुना ने दो भ्रमर को, गाने दो मन की कोयल को। संघर्ष और जिजिविषा, पहाड़ों की तलहटी में नदी से, सीख ले पत्थरों को चीरना। डूबने का डर छोड़कर जान ले, पानी के वक्ष पर नाव से चलना। कभी सुनो तो सही, बाग में बैठकर शांति से, खेलते बच्...
मां
कविता

मां

डॉ. भगवान सहाय मीना जयपुर, (राजस्थान) ******************** मां की परिभाषा संसार। ममता ईश्वर का आकार। मां करती जीवन साकार। बिन तेरे यह जग बेकार। मां ईश्वर का अहसास, जन्नत होता मां का प्यार। मां बिन प्रभु भी लाचार। चुकता नहीं मां का उपकार। मां खुश होती है, जग में जीवन अपना वार। मां अनगिनत तेरे प्रकार। तूं ही दुनिया की सरकार। भिन्न नहीं ईश्वर से मां, बनता नहीं बिन मां संसार। संतान में माॅं होती संस्कार। मां ही जग की तारणहार। प्रकृति संवारने में होती, ईश्वर को माॅं की दरकार। मां की परिभाषा संसार। ममता ईश्वर का आकार। परिचय :- डॉ. भगवान सहाय मीना (वरिष्ठ अध्यापक राजस्थान सरकार) निवासी : बाड़ा पदम पुरा, जयपुर, राजस्थान घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कवित...