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Tag: संजय कुमार नेमा

राखी की छटा
कविता

राखी की छटा

संजय कुमार नेमा भोपाल (मध्य प्रदेश) ******************** भाई बहन का परस्पर विश्वास, राखी का त्यौहार आया।। शब्दों का नहीं पवित्र बंधन का त्यौहार लाया। बचपन की याद, मिठाई की मिठास दिलाती है राखियां।। सावन का त्यौहार बहनों का खास दिन, लाए ये राखियां। अटूट प्रेम का भाव है राखियां।। भाई की कलाई की शान है यह राखियां। राखी के त्यौहार संग बहनों का साथ।। बहनों की रक्षा का वचन दे भाई का हाथ। अब बहना क्यों ना इतराए राखी के साथ।। सज संवर कर बहने अब मायके आई। घर की खुशियां बहनों की राखी संग आई।। मीठे पकवानों की सुगंध भैया के मन को भाई। खुशियां उमंगों संग भाई की कलाई को सजाती है राखियां।। भाई बहन का बंधन प्यार एवं विश्वास को बढ़ाती है ये राखियां। माथे पर तिलक लगाकर भाई के गौरव को बढ़ाती यह राखियां।। राखी की छटा देखते मांभी झूमे संग संग। परिचय :- संजय कुमार नेमा निवासी :...
सावन
कविता

सावन

संजय कुमार नेमा भोपाल (मध्य प्रदेश) ******************** सावन की झड़ी संग नाचे मेरा मन। बदरा भी ढोल बजाए। आराधना के तीज त्यौहार लेकर, मेरे महादेव चौमासे पर आये। देख नजारे नयना से मौसम का, मन भी कितना भाये।। सावन, खुद महादेव को जल चढ़ाने आये। बदरा भी ढोल बजाये।। सावन की घटा संग नाचे मयूर मन। झरते, झरने हरियाली भी मन को रिझाये।। बरसे सावन की घटायें। नाचे मन मयूर संग। सावन की हरियाली तीज पर, पेड़ों की डाली भी, झूम कर झुक-झुक जायें। हरियाली की चुनरी से श्रृंगार कर, धरा को घुंघट उढायें। बरसे सावन की घटाएं।। जिसे देख नाचे मेरा मन। परिचय :- संजय कुमार नेमा निवासी : भोपाल (मध्य प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने पर...
किताब मैं तस्वीर
कविता

किताब मैं तस्वीर

संजय कुमार नेमा भोपाल (मध्य प्रदेश) ******************** किताबों मैं तेरी तस्वीर छुपा दी थी कभी तस्वीर नहीं दिखती खोजता हूँ तुझे अब किताबों में। हाथों की लकीरों में तेरा नाम देखूं अब यादों में कहीं उनका जिक्र हो । भीगी पलकों से याद करते हुए तुम्हें खोजा चाहत ही रही । तुम्हें पाने की ... किताबों में छुपी तस्वीरें अब सपने में ही देखता अब तो अनजान रिश्तों के लिए बेचैन हूं। ढूंढता हूँ तस्वीर को जो किताबों में छुपा दी। परिचय :- संजय कुमार नेमा निवासी : भोपाल (मध्य प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि...
नदी नदियां
कविता

नदी नदियां

संजय कुमार नेमा भोपाल (मध्य प्रदेश) ******************** पर्वतों से निकलकर प्रवाहिनी, अविरल बहती उछलती कूदती, अपने पथ को तलाशती। पतली सी मासूम सी जलधारा में पानी बचा शेष। घुटनों भर पानी से भिंगोकर हो जाते पार। अब हम हो रहे मायूस।। लुप्त हो रहे जंगल सूख रही वाटिकांए। अपना गंतव्य तलाशती, निर्झर बहती धाराओं‌ में अब शेष रह गई रेत। बिन पानी हम हो गए मायूस। जैसे ही अषाढ़, सावन, भादों, बरसता भर जाता उसका थाल। अब नदिया इतराती, मतवाली सी बदली उसकी चाल। दोनों किनारों का अब हरियाली की चुनरी से जलमाला का होता श्रंगार। वर्षा जल से भरकर, उछले कूदे मैदानों में आकर निर्झरिणी की बहती धारा। अंत समय में शीतलता से सब साथ, तनुजा ने लाकर सब कुछ समर्पित कर दिया सागर को। सब कुछ देकर भी तरनी, तटनी, ने अर्पित करके सबका जीवन साकार किया। अब ना करो मन-माना सदा नीर का दोहन। सदा न...
साहस
कविता

साहस

संजय कुमार नेमा भोपाल (मध्य प्रदेश) ******************** अब ठान लिया, साहस से उस पथ को चुनना है। जिस पथ को बागों ने फूलों से संवारा है। साहस ही मुझको, सपनों से होकर मंजिल तक ले जाएगी। साहस ही मुझे सूरज सा चमकायेगा।। अब चुनता हूं, उस पथ को, ऊंचे नीचे पहाड़ी रास्ते। टेढ़े-मेढ़े रास्ते,‌ पथरीली रास्ते। साहस से ही रास्ता बनाऊं। रास्ते भी नऐ हैं, नये अरमानों के बीच चौराहों को देखूं।। रास्ता अपना खोजूं साहस से ही नये, लक्ष्यों तक पहुंचूं।। अट्टहास करूं, जोर-जोर से शोर मचाऊं।। अपने निर्णय से लोहे को ही झुकाऊं। चमकीले पत्थरों से हमेशा दूर हो जाऊं। अब साहस से ही चलना है।। दिन-रात खपना है, लक्ष्य अब लंबा लगता नहीं। सपनों से ही हौसलों को बढ़ाऊं। मुश्किलें मुझे झुका ना सकीं।। सफलता की कोई तारीख तय नहीं। साहस ही तो मुझे, नई सोच, कार्य उत्कृष्टता से, सफलता की सीढ़ियां चढ़व...
कश्ती कागज की
कविता

कश्ती कागज की

संजय कुमार नेमा भोपाल (मध्य प्रदेश) ******************** कश्ती कागज की, मझधारो में मिल जाए कोई खिवईया। कोई तो पार लगाएं ‌ सागर के नीले पानी में।। संभालो मुझे तूफानों में, हिलोरों में, कश्ती न डूबे जज्बातों में। ये कश्ती कागज की बहते पानी में।। समुद्र के बीचों बीच, दिखता न कोई किनारा। अब कोई हाथ तो थामें, लगा दो अब किनारे। गहराई में लहरों से डगमग चलती ये कश्ती।। अब कश्ती है मझधारों में।। ये कश्ती कागज की बहते पानी में।। अब नहीं है कोई खिवैया, अब मैं राह भटकूं।। इन मजधारों में, आंधी में तूफानों में। हुनर है मेरे पास, मुझे तो बचना आता।।‌‌ अब इन मजधारों में। यह कश्ती कागज की बहते पानी में।। ‌ अब भी है हौंसला, हम तो बैठे कागज की नाव में। इंतजार है उन लहरों का, मजधारो में।। अब लहरें इतराती नहीं, इठलाती नहीं।। किनारा दूर नहीं। अब कोई मुझे रोक न सका, ट...
शहर ऐक कोना सा‌‌
कविता

शहर ऐक कोना सा‌‌

संजय कुमार नेमा भोपाल (मध्य प्रदेश) ******************** शहर ऐक कोना सा। खो गया मैं मंजिलों की अट्टालिका मैं, बिछड़ गया मैं भीड़ भरी जिंदगी में।‌ ना पूछे कोई खैर खबर, ना मिले सगे संबंधी। ना मिली चौपाल की बैठक।।‌‌ शहर ऐक कोना सा‌‌ कहां खो गई आम, नीम, पीपल की छांव।‌‌ नहीं दिखता दूर-दूर परिंदा, ना मुझे मिली इतराती कोयल की कुहू कुहू की आवाज।। ना मिले नीम, पीपल की छांव में लहराते झूले। शहर ऐक कोना सा। शहर की अट्टालिका में ढूंढ रहा अपनों को, न मिले सगे संबंधी।‌‌ ना मुझसे कोई पूछे खैर खबर।‌ शहर ऐक कोना सा। ना बोले प्यार से, भैया जय राम जी, जय गोपाल जी। निकला वह बाजू से, बोला हाय गुड मॉर्निंग।।‌ शहर ऐक कोना सा। ना दिखता सुबह का सूर्य उदय, ना सुनता पक्षियों का कलरव, ना मीठी कोयल की कुहू कुहू। ना मिला भोंरौ का गुंजन। शहर ऐक कौना सा। ना मिली माटी की...
सुनो जी मैं हूं ना
कविता

सुनो जी मैं हूं ना

संजय कुमार नेमा भोपाल (मध्य प्रदेश) ******************** दूर जाते हुए बस, आंखों का इशारा कहता हे ना, सुनो जी मैं हूं ना। जब मैं बाहर से आता तब, एक हाथ में गिलास पानी थामे कहती कि सुनोजी मैं हूं ना। कुछ परेशान सा दिखा और कुछ कहना हो, दिल को समझाना हो तब कहती सुनो जी मैं हूं ना।। मायके की याद आये, तब मैं कहता, सुनो जी बाहों का सहारा मैं हूं ना। जब आते आंखों में आंसू, रुमाल से पोंछ ते हुए, तो कहता सुनो जी मैं हूं ना।। अब वह बोली कुछ भूली, बिसरी यादें भविष्य के गढ़े हम मीठे सपने, सुनो जी मैं हूं ना।। मैं बोला, अरे मेरी कुछ खट्टी, कुछ मीठी। अब सुनो जी अनूठा हो यह जन्मदिन।। तुम्हारी खुशी के लिए इसी में खुश हूं, कि तुम खुश हो ना। अब मनाएं आपका ये जन्मदिन। मैं हूं ना।। मेरी सुनो जी, शुभ हो शुभ ज्योतिर्मयी हो। जन्मदिवस मंगलमय हो।। जीवन दीप जले अविरत, फैले प्रका...
हां मैं पुरुष हूं …
कविता

हां मैं पुरुष हूं …

संजय कुमार नेमा भोपाल (मध्य प्रदेश) ******************** हां मैं पुरुष हूं ।। विधाता की रचना हूं। मैंब्रह्मा हूं, विष्णु हूं, महेश हूं। मै एक पुरुष हूं।।‌‌ नारी का अभिमान हूं, नारी का सौभाग्य हूं। हां में एक पुरुष हूं।।‌‌ मन की बात मन में रखकर ऊपर से हरदम, खुशमिजाज दिखने वाला परिवार की जिम्मेदारी निभाने वाला। हां मैं पुरुष हूं।।‌‌ पिता का स्वाभिमान हूं, मां के आंचल का अभिमान हूं। बचपन से घर की जिम्मेदारी लेने वाला पिता के सपनों को साकार करने वाला। हां मैं एक पुरुष हूं मैं।।‌‌ जीवन में आतेही, आपेक्षाओं से लगता है यह जीवन। बहन की शादी के सपनों का आधार हूं। हां मैं एक पुरुष हूं।।‌‌ थक कर कभी हारा नहीं, निरंतर मुझको चलना है हरदम।। आशाओं की मीनार हूं। परिवार का आधार स्तंभ हूं।। हां मैं एक पुरुष हूं।।‌ रो में सकता नहीं, डर अपना बतला सकता नहीं। ...