मन की नम् माटी
सुषमा शुक्ला
आबिदजान (अफ्रीका)
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मन की नम मिट्टी में जब भावों का बीज गिराया,
आँखों की कोरों ने चुपके से जल बरसाया।
पीड़ा की हल्की धूप में सपनों ने अंगड़ाई ली,
आशा की कोमल कोंपल ने फिर मुस्कान सजाया।
मन की नम मिट्टी में श्रद्धा का दीप जले,
विश्वास की खुशबू से जीवन के आँगन पले।
संघर्षों की धूल भले ही राहों में बिखर जाए,
धैर्य की फसल उगे तो भाग्य के द्वार खुले।
मन की नम मिट्टी में रिश्तों के फूल खिलें,
ममता की सरिता बहे, प्रेम के मोती मिलें।
अंतर की करुणा जब बन जाए हरियाली,
सूखे से जीवन में फिर सावन झूमे खिलें।
मन की नम मिट्टी में संस्कारों की जड़ हो,
सत्य की धूप मिले, मर्यादा का अंकुर हो।
लोभ की आँधी आए तो भी न डिग पाए,
नीति का वटवृक्ष बने, आदर्शों का स्वर हो।
मन की नम मिट्टी में ईश्वर का नाम पले,
भक्ति का अंकुर फूटे, आत्मा के दीप जले।
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