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ना अबला हूं ना मैं बेचारी हूं

विकास कुमार
औरंगाबाद (बिहार)
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ना अबला हूं ना मैं बेचारी हूं,
मै आज की युग की नारी हूं।
कम मुझे आप मत आको,
मै इस सारी दुनिया पर भारी हूं।।

सदियों से जीती औरो के लिए,
सदियों से यह अत्याचार सहे।
हर बात पर एक सीमा होती है,
ऐसे घुट–घुट कर कौन रहे।।

ना अबला हूं ना मैं बेचारी हूं,
मै आज की युग की नारी हूं।

नही डरती हूं मैं इस दुनिया से,
बस अपनो से सदा मैं हारी हूं।
कम मुझे आप मत आको,
मै आज की युग की नारी हूं।।

मैं बाहर काम पड़ने पर जाती हूं,
परिवार का अभिमान बढ़ाती हूं।
गृहस्थी का गाड़ी स्वय चलाती हूं
अपने परिवार खुश रख पाती हूं।।

ना अबला हूं ना मैं बेचारी हूं,
मै आज की युग की नारी हूं।

फिर मैं लोगों का हवस
का शिकार बन जाती हूं,
जान बचाने के लिए
जोर–जोर से चिलाती हूं।
फिर भी मै अपने बातों
को नही बता पाती हूं,
फिर भी भारत में
महिला दिवस मनाती हूं।।

आज लोग महिला दिवस पर
महिला को सम्मान करेंगे,
कल फिर इस महिला को सड़को
और घरों में अपमान करेंगे।
शादी के नाम पर इस लड़की
को दहेज के लिए ही जलाएंगे,
कोई प्यार से लायेंगे तो इल्जाम
लगाकर घर से भगाएंगे।।

ना अबला हूं ना मैं बेचारी हूं,
मै आज की युग की नारी हूं।

परिचय :विकास कुमार
निवासी : दाऊदनगर औरंगाबाद (बिहार)
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।


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