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प्रतिस्पर्धा कहीं बन ना जाए अवसाद का कारण

सीमा रंगा “इन्द्रा”
जींद (हरियाणा)

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जीत तू जरूर छू ऊंचाइयों को, कर मेहनत जरूर, सपने कर पूरे बस तू , कर मेहनत

आज के आधुनिक दौर में आगे निकलने की दौड़ में सभी अपना वजूद ही खोते जा रहे हैं ।जो है उनके पास स्वीकार ही नहीं कर पा रहे हैं ।माता-पिता प्रतिस्पर्धा की दौड़ में अपने बच्चे को ही प्रथम लाना चाहते हैं। अच्छी बात है, पर दूसरों के साथ तुलना करके क्यों? सभी बच्चों में कौशल होता। हालांकि ये अलग बात है कि प्रतिभा अलग-अलग है। जैसे कोई चित्रकारी में, कोई नृत्य में, कोई गाने में, कोई पढ़ने में, कोई खेल में, कोई अपने घर के कार्यों में, पर अभिभावक चाहते हैं की हमारा बच्चा ही हर काम में प्रथम आए। हमें सिर्फ अपने बच्चे की प्रतिभा को देखना है। वह किस क्षेत्र में अच्छा है, उसकी प्रशंसा करना, ना की उस पर इतना दबाव बनाना की वह अवसाद में चला जाए।

आज के दौर की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि बच्चे भी अवसाद से ग्रसित हो रहे हैं। पहले जमाने में तो अवसाद क्या होता है किसी को पता ही नहीं था। पर आज इसने अपना विकराल रूप धारण कर लिया है कि हमारे छोटे-छोटे बच्चों को भी नहीं छोड़ रहा है। यही माहौल हर जगह बन गया है सभी एक दूसरे से प्रतिस्पर्धा रखते हैं। चाहे वह नौकरी हो, एक- दूसरे से आगे निकलना अच्छी बात है पर परंतु उसे अपने पर हावी ना होने दें। हैसियत को देखकर ही तमाम कार्य करने चाहिए ना कि एक दूसरे की देखा-देखी। लोग दौड़ में लग जाते हैं उससे अच्छा घर, उससे अच्छे कपड़े, उससे अच्छी गाड़ी। क्यों? हमें सिर्फ और सिर्फ अपना देखना है हमारे हालात कैसे हैं। हमारे पास कितना धन है ,यह नहीं कि दूसरों से अच्छा कैसे बनना और आगे कैसे निकलना है। क्योंकि सब में प्रतिभा होती है यह अलग बात है कि कोई पहचान लेता। कोई नहीं पहचानता, सिर्फ दौड़ में लग जाता है। यही दौड़ अवसाद का कारण बनती है क्योंकि हम एक-दूसरे से आगे निकलने की दौड़ में समय, पैसा, सुख-चैन खो देते हैं। हमें पता भी नहीं चलता कब हम इस प्रतिस्पर्धा की भाग दौड़ में समय, पैसा और सुख-चैन को खो दिया। जब तक बात हमें समझ आती है अवसाद हमें चारों तरफ से घेर लेता है।
दुनिया भर में अवसाद ने अपने पैर पसार रखे हैं। अकेले भारत में लगभग २० करोड़ लोग अवसाद से ग्रसित है। हमें जो मिला है उसमें खुश क्यों नहीं। ऐसे ही सारी सुख-सुविधाएं होने के बाद भी खुश नहीं है। क्योंकि उन्हें दूसरों से ज्यादा कमाना है, कमाइए जरूर । पर उसे अपने जीवन पर हावी ना होने दें। और -और की चाहत में जो है उससे भी हाथ ना धो बैठे और-और की चाहत में जो है उसका भी लुत्फ उठा ना पाते हैं। बहुत लोग दिन -रात मेहनत करते हैं। कई बार तो अपने घर वालों के साथ समय भी नहीं बिताते हैं। ना ही परिवार के साथ बात करने का समय होता। और कई वर्ष लग जाते मंजिल तक पहुंचने में, कई असफल भी हो जाते हैं। और बाद में बोलते हैं कि हमें तो पता ही नहीं चला कब बच्चे बड़े हो गए। हमें तो कमाने में व्यस्त थे कि बच्चों का बचपन भी नहीं देख पाए। कोई इस जमाने में खुश ही नहीं है चाहे उसकी तनख्वाह ५०,००० है, या लाख-लाख है। कोई भी खुश नहीं है। सभी प्रतिस्पर्धा की दौड़ में जो है, उससे भी जाते है। इसीलिए ज्यादा से ज्यादा सोचते रहते हैं यही सोचना उन्हें अवसाद की तरफ ले जाता है ।
जिंदगी है हसीन जी ले इसे, गंवा देगा कीमती वक्त रह जाएगा पछताता, मिलेंगे ना दुबारा ये सुनहरे पल।

परिचय :-  सीमा रंगा “इन्द्रा”
निवासी :  जींद (हरियाणा)
विशेष : लेखिका कवयित्री व समाजसेविका, कोरोना काल में कविताओं के माध्यम से लोगों टीकाकरण के लिए, बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ हेतु प्रचार, रक्तदान शिविर में भाग लिया।
उपलब्धियां : गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड से प्रशंसा पत्र, दैनिक भास्कर से रक्तदान प्रशंसा पत्र, सावित्रीबाई फुले अवार्ड, द प्रेसिडेंट गोल्स चेजमेकर अवार्ड, देश की अलग-अलग संस्थाओं द्वारा कई बार सम्मानित बीएसएफ द्वारा सम्मानित। देश के अलग-अलग समाचार पत्रों में रचनाएं प्रकाशित,कई अनपढ़ महिलाओं को अध्यापन।
प्रकाशन : सतरंगी कविताएं, काव्य संग्रह।
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।


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