
अंजनी कुमार चतुर्वेदी
निवाड़ी (मध्य प्रदेश)
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मिलकर नीर बचाना होगा,
वरना पछताओगे।
वसुधा छोड़ नीर पाने को,
और कहाँ जाओगे।नित धरती का दोहन करके,
इसको व्यर्थ बहाते।
कमी दीखती जब पानी की,
तब क्यों तुम पछताते।रखें सहेज सदा पानी को,
इसकी कीमत जाने।
पानी है हम सबका जीवन,
कीमत भी पहचाने।धीरे-धीरे कभी इस तरह,
होगी गर पानी की।
प्यासे, बिना नीर आएगी,
याद तुम्हें नानी की।जितनी पड़े जरूरत हमको,
इतना पानी ले लें।
वरना सूख जाएंगी पल में,
सबकी जीवन बेलें।पानी है अनमोल खजाना,
मिलकर ऐसे सहेजें।
मानव कर प्रयत्न पी लेगा,
कहां जानवर भेजें।दिन दूनी और रात चौगुनी,
गर्मी बढ़ती जाती।
जलस्तर घट रहा निरंतर,
धरती सूखी जाती।पशु पक्षी बेचैन भटकते,
जहां नीर पाते हैं।
बाजी लगा जान की अपनी,
वहीं चले जाते हैं।अब गर्मी तन बदन जलाती,
पीड़ा सही न जाती।
सूख रहे जल श्रोत समूचे,
चिंता हमें सताती।सीमित हो उपयोग नीर का,
भू पर वृक्ष लगाएं।
बने सहायक वृक्ष मेघ के,
नीर तभी हम पाएं।
परिचय :– अंजनी कुमार चतुर्वेदी
निवासी : निवाड़ी (मध्य प्रदेश)
शिक्षा : एम.एस.सी एम.एड स्वर्ण पदक प्राप्त
सम्प्रति : वरिष्ठ व्याख्याता शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय क्रमांक २ निवाड़ी
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।
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