
ललित शर्मा
खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम)
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ये पक्षियों का अपना जीवन
जीने की अपनी इनकी शैली
कितनी सूंदर
कितनी होती अलबेली
निर्भरता बिन खुद
खुशियों में बीतती
पशु पक्षियों की कार्यशैली
करते काम वही
जिनमें लगता आराम
घोंसला स्वयं बनाते
एक एक पत्तियों तिनखे
चुगने को निकल जाते
भोर में शाम तक
ये प्यारे न्यारे पक्षी
अपना काम जिमेवारी से
स्वयं निभाते
किसी को किसी से
नहीं होता भरोसा
खुद घरौंदा बनाने निकल जाते
बच्चो को पहले खिलाते
जुगाड़ में दूर दूर तक जाकर
उदरपूर्ति के जुगाड़ में उड़ जाते
पक्षियों की अलबेली दुनिया
शांति सुख से जीवन बिताते
पेड़ पर रहने का बसेरे
एक एक तिनका चुगकर
मुहं में लपेट लपेटकर
अपना आवास
बेरोकटोक बनाते
किसी पर निर्भरता नहीं
ये पक्षियों का संसार
हंसते हंसते जिंदगी
जीना हमको सिखलाते
हरे भरे घने जंगलों पेड़ो पौधे में
चिंतामुक्त ये पक्षी
अपना जीवन बिताते
इन पक्षियों के घोंसले
एक जैसे नजर नहीं आते
अपने घोंसले के सिवाय
किसी पराए घोसले में
कभी नहीं घुसते सुने जाते
ये पक्षियों का संसार
खुशी से जीने की
चाहते सिखलाते
पक्षियों में होती
अजीब वह कला
मनुष्य से ज्यादा
खुशहाली पक्षियों में
कूट कूटकर
हम नजर कर पाते
पक्षियों का संसार
कितना सुहावना
कितना अलबेला
हम जाने क्यों समझ
अबतक नहीं पाते
यही है खुशहाल जीवन
क्यों नही सीख पाते
निवासी : खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम)
संप्रति : वरिष्ठ पत्रकार व लेखक
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