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भटकाव

छत्र छाजेड़ “फक्कड़”
आनंद विहार (दिल्ली)
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जिंदगी में
भटकाव ही भटकाव है
भटकाव दर भटकाव
मेला लगा है भटकावों का
मन का भटकाव…
तन का भटकाव…
मन चंचल है
न जाने कहाँ-कहाँ भटकता है….

जब मन भटकता है
मनु की सोच भटकती है
जब चटकती है
अतृप्त महत्वाकांक्षाएं
जब खटकती है पर-प्रगति
लटकती है लालसायें
मटकती मन-मरीचिका
सोच को उद्विग्न करती है

मन डूबता जाता है
आकांक्षाओं के समंदर में
समंदर में भांति भांति की
क्रोध,मा न, माया,
लोभ सरूपी मीन
सुनहरी आकर्षित
करती मछलियाँ
मन डोल कर हो
जाता है पथच्युत
भटकता स्व-निर्मित
जाल में….

तन जब भटकता है
उद्वेलित कर काम
आवेशित कर तृष्णा
भटका देता है मन भी
भटकती राहें तन लिप्सा की
बदल जाते संदर्भ
जब भटकते तन-मन
कहाँ बच पाता मन भटकाव से

कैसे हो पाये मन स्थित प्रज्ञ
कैसे लिख पाये व्यथित मन
कवित, गीत, गजल, छंद
भटकते मन से
अब नामुमकिन सा है
नियंत्रित करना
कौन और कैसे नियंत्रित करे
भटकाव
जीवन का पर्याय बन गया है
भटकाव….!

परिचय :- छत्र छाजेड़ “फक्कड़”
निवासी : आनंद विहार, दिल्ली
विशेष रूचि : व्यंग्य लेखन, हिन्दी व राजस्थानी में पद्य व गद्य दोनों विधा में लेखन, अब तक पंद्रह पुस्तकों का प्रकाशन, पांच अनुवाद हिंदी से राजस्थानी में प्रकाशित, राजस्थान साहित्य अकादमी (राजस्थान सरकार) द्वारा, पत्र पत्रिकाओं व समाचार पत्रों में नियमित प्रकाशन, राजस्थानी लोक गीतों के लिए प्रसिद्ध कंपनी “वीणा कैसेटस” के दो एलबमों में सात गीत संगीतबद्ध हुये हैं।
सम्मान : “राजस्थानी आगीवान” सम्मान से सम्मानित
श्री गंगानगर के सृजन साहित्य संस्थान का सृजन साहित्य सम्मान व
सरदारशहर गौरव (साहित्य) सम्मान व अनेक अन्य सम्मानरा
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।


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