
विजय वर्धन
भागलपुर (बिहार)
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एक दिवस लवकुश ने
माता सीता से यह प्रश्न किया,
कौन हैं मेरे पिता हे माता
किस कुल मैंने जन्म लिया,
मैया बोली यथा समय मैं
ये सब तुझे बताउंगी,
तेरी जिज्ञासा को एक दिन
तुझको मैं समझाऊंगी,
कुछ ही दिनों के बाद विपिन में
लक्ष्मण का आगमन हुआ,
सेना भी थी साथ अस्त्र से
दिशा-दिशा झंझनन हुआ,
जब आश्रम के पास वे पहुंचे
लव कुश से सामना हुआ,
चचा भतीजे में जमकरके
बाणों से आघात हुआ,
घायल होकर जब लक्ष्मण
पहुंचे निज कौशल धाम में,
व्यथित हो गए राम देखकर
अनुज लड़े संग्राम में,
बोले अनुज कहो किसने तुम्हें
ऐसा रक्त रंजित है किया,
जिसने मेघनाद को मारा
कैसे वह अब विजित हुआ,
लक्ष्मण बोले भैया वन में
दो बालक हैं ऐसे वीर,
जिनने मुझको घायल करके
बना दिया अत्यंत गंभीर,
क्रोध से प्रभु के आंख हो गए लाल
भुजायें फड़क उठीं,
रथ पर चढ़ कर चले विपिन को
सेना भी पीछे उमड़ी,
पिता पुत्र जब हुए सामने,
माता सीता दौड़ पड़ी,
बोलीं यह क्या करते पुत्रों,
यह अन्याय न करो कभी,
ये ही तेरे पिता हैं ये ही
कौशल देश के राजा हैं,
इन पर तुम क्या वार करोगे,
सबके भाग्य विधाता हैं,
होकर विह्वल राम जी रथ से
उतर धरा पर दौड़ पड़े,
दोनों पुत्रों को बांहो में
लेकर वे हो गए खड़े,
चूम-चूम कर पुत्रों को
निज स्नेह से अपने सिक्त किया,
और अश्रुधारा से उन दोनों
को ही अभिषिक्त किया,
बोले सिय तुम धन्य हो
नारी जो ऐसा संस्कार दिया,
पुत्र हमारे धीर वीर हैं
जिनने मन को मोह लिया,
सूर्यवंश के सूर्य हैं ये,
ये आर्यावर्त्त के अद्भुत लाल,
इनसे वैरी दूर भगेंगे,
दूर भगेंगे क्रूर कराल।
पिता जी : स्व. हरिनंदन प्रसाद
माता जी : स्व. सरोजिनी देवी
निवासी : लहेरी टोला भागलपुर (बिहार)
शिक्षा : एम.एससी.बी.एड.
सम्प्रति : एस. बी. आई. से अवकाश प्राप्त
प्रकाशन : मेरा भारत कहाँ खो गया (कविता संग्रह), विभिन्न पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित।
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।



