
डॉ. भगवान सहाय मीना
जयपुर, (राजस्थान)
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फीके-फीके अब लगे, होली तेरे रंग।
क्यूं बेसुरे से हो गये, फागुन वाले चंग।
बहुरंगी दुनिया में, शेष ना असली रंग,
ढ़ोल नगाड़े प्रेम के, बजते नहीं मृदंग।
खास वर्जित है, आकर दबे पाँव लगाना,
गुलाल गजबन गालों पे, नहीं सुहाती अंग।
फागुन में धूमिल पड़ी, रसिया वाली रात,
गुलमोहर की डाल पर, बसंत नंग-धड़ंग।
बदले बदले मौसम में, दुखी खड़ा पलाश,
फागुन अब नहीं खेलता, रंग रंगीला फाग।
रिश्तों में से गायब है, चंदन की सी महक,
चौपालों पर बस्ती में, बजती नहीं भपंग।
लाती नहीं कुमारियां, अब गेहूँ चने की बाल,
कच्चे पक्के मासूमों को, देख बिड़कुल्ले दंग।
पीलिया ग्रसित ठिठोली, मन में मीठी आग,
प्रीत प्रेत सी देखकर, भौचक धुरखेल के रंग।
परिचय :- डॉ. भगवान सहाय मीना (वरिष्ठ अध्यापक राजस्थान सरकार)
निवासी : बाड़ा पदम पुरा, जयपुर, राजस्थान
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।
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