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जीवन का अभिशाप

भीमराव ‘जीवन’
बैतूल (मध्य प्रदेश)
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और रहा कितने दिन बाकी,
राजन् पश्चाताप।
हारा गणित हमारा लेकिन,
जुमले सका न माप।।

मुरझाई गमलों में सारी,
रोपित आशाएँ।
नागफनी-सी हुई पल्लवित,
निंदित भाषाएँ।।
तहज़ीबों की इस बस्ती में,
पसरा है संताप।।

सपने देखे उड़ने के जिस,
उड़न-खटोले से।
आडंबर का जिन्न बड़ा हो,
निकला झोले से।।
कुटिल नीति के कोड़े मारे,
ये दिल्ली की खाप।।

जकड़े हम बाजारवाद के,
खूनी पंजों में।
फँसे हुए हैं वोट बैंक के,
बने शिकंजों में।।
रखा हुआ है गिरवी अपना,
अनुवांशिक आलाप।।

उलझ गया सब ताना-बाना,
भ्रमित नीतियों में।
हिंसकपन बो रही व्यवस्था,
राग-रीतियों में।।
सूत्रधार ही लगता है अब,
‘जीवन’ का अभिशाप।।

परिचय :- भीमराव ‘जीवन’
निवासी : बैतूल मध्य प्रदेश
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है।

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