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चंद उदासियां

डॉ. भगवान सहाय मीना
जयपुर, (राजस्थान)
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बैठ जाता है इंसान शाम को,
छत पर चंद उदासियों के साथ।
समय और भाग्य कोसने को,
हालात की सिसकियों के साथ।

विचारों के घोर द्वन्द में उलझा,
ओढ़े हुएं आशंका की कालिमा।
अंधेरे की टीस में देखता नहीं,
वह डूबते सूरज की लालिमा।

कल की फिक्र में आज विकल,
जबकी “कल किसने देखा” है।
दिशा और दशा पलटती पल में,
बहती हवा कान में समझाती है।

जब हमारी चाहत के मुताबिक,
यह ज़िंदगी थोड़ा मचलती नहीं।
हो जाता है मन बड़ा दुखी जब,
बेलगाम ख्वाहिशें मुस्कराती नहीं।

रास्ता जारी हर दिन प्रयास कर,
कुंदन निखरता है दहकने पर।
लौटती है शाखाओं पर खुशबू,
पतझड़ की जद से निकलने पर।

परिचय :- डॉ. भगवान सहाय मीना (वरिष्ठ अध्यापक राजस्थान सरकार)
निवासी : बाड़ा पदम पुरा, जयपुर, राजस्थान
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।


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