
श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी
लखनऊ (उत्तर प्रदेश)
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अक्सर परेशान होता है मन
जबकि, अपने दर्द को
जुड़ाव में बदल सकता है
पत्थर पर सहानुभूति
को निखार सकता है
फिर भी
परेशान रहता है मन!!
सब कहते हैं, अंधेरे दिनों में
मोमबत्तियां जलाना सीखो,
यादों की चिंगारी को
रूह से हटाना सीखो,
अवसाद में रहना जिंदगी के
सही मायने नहीं होते .
ये समझता है,
फिर भी
परेशान. रहता है मन!!
अवसाद से भरा जीवन
भीतर खालीपन भार देता है,
हृदय का खोखलापन,
धड़कनों की लय को
धीमा कर देता है,
आशा और निराशा
जीवन के दो पहलू हैं,
खुशी एक निर्णय है,
जो स्वयं से हमे लेना होता है ,
सब कुछ जानता है,
फिर भी
क्यों परेशान होता है मन!!
जिंदगी के तूफान
आत्मा को तोड़ देते हैं,
बदलते समय की बरसाती
किसी चमत्कार से
कम नहीं लगती,
मन के उमड़ते
ज्वालामुखी को शांत कर देती है,
स्वयं को स्वयं की
दृढ़ता से समझाना पड़ता है,
ये जानता है,
फिर भी
नहीं मानता
परेशान होता है मन!!
पत्थर भी आग में
तप कर सोना होता है,
सूरज ढलता नहीं,
पूरब से पश्चिम की
यात्रा तै करता है,
तभी तो हर रात
के बाद सबेरा होता है,
ये तो जिन्दगी के चंद लम्हें हैं,
सब कुछ जानता है …
फिर भी
परेशान सा रहता है मन!!
परिचय :- श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी
पति : श्री राकेश कुमार चतुर्वेदी
जन्म : २७ जुलाई १९६५ वाराणसी
शिक्षा : एम. ए., एम.फिल – समाजशास्त्र, पी.जी.डिप्लोमा (मानवाधिकार)
निवासी : लखनऊ (उत्तर प्रदेश)
सम्मान : राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर द्वारा “जीवदया अंतर्राष्ट्रीय सम्मान २०२४” से सम्मानित
विशेष : साहित्यिक पुस्तकें पढ़ने के शौक ने लेखन की प्रेरणा दी और विगत ६-७ वर्षों से अपनी रचनाधर्मिता में संलग्न हैं।
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।
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