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अंतःकरण

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी
लखनऊ (उत्तर प्रदेश)
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मनुष्य का संघर्ष
बाहरी मुश्किलों से नहीं
स्वयं से होता है,
इंसान का मन कई
परतो में विभाजित है,
इनमे न्याय, स्वार्थ,
अन्याय के विचारों में
द्वंद सदैव चलता है।

मान- सम्मान और
पहचान की आकांक्षा
मनुष्य को विचारों के
जाल में उलझा देती है।

मनुष्य की विशेष प्रवृत्ति,
स्वयं को सही साबित
करने हेतु तर्क-वितर्क
करता है स्वयं को
नैतिक समझता है!

शक्ति और नियन्त्रण
के प्रति आकर्षित हो
अपने विचार
मनवाना चाहता है!
दूसरों को प्रभावित कर
स्वयं की स्थित दृढ़
करना चाहता है!

मनुष्य की यही मनोदशा
संबंधो को कमजोर करती है,
आपसी संवाद में
दूरिया पैदा करती हैं,
संवाद एवं सहयोग के
स्थान पर प्रतिस्पर्धा
जन्म लेती है !!

शुद्ध परिवर्तन स्वयं के
भीतर से ही जन्म लेता है
मनुष्य जब अपनी
कमजोरियों को स्वीकार
करने लगता है
स्वयं को
समझने लगता है
उसे समझना होता है कि
हर समय वह सही
नहीं हो सकता,
उसी क्षण मनुष
स्वयं के प्रति
इमानदार हो जाता है।

वह समझ जाता है
संघर्ष का उद्देश हराना नहीं,
स्वयं को समझना है
जब मन स्पष्ट हो जाएगा,
जटिलताएं भी सरल
प्रतीत होने लगेंगी
यही से नई शुरुआत होती है
जहाँ आरोप नहीं संवाद होता है
संघर्ष नहीं संतुलन होता है!!

परिचय :- श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी
पति : श्री राकेश कुमार चतुर्वेदी
जन्म : २७ जुलाई १९६५ वाराणसी
शिक्षा : एम. ए., एम.फिल – समाजशास्त्र, पी.जी.डिप्लोमा (मानवाधिकार)
निवासी : लखनऊ (उत्तर प्रदेश)
सम्मान : राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर द्वारा “जीवदया अंतर्राष्ट्रीय सम्मान २०२४” से सम्मानित
विशेष : साहित्यिक पुस्तकें पढ़ने के शौक ने लेखन की प्रेरणा दी और विगत ६-७ वर्षों से अपनी रचनाधर्मिता में संलग्न हैं।
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।


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