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शांति का कोहराम

विजय गुप्ता “मुन्ना”
दुर्ग (छत्तीसगढ़)
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दुकान किसान डेयरी, गत पीढ़ी के काम।
फसी डोर सुलझी रहे, घर निवास सुखधाम।।

अल्प इच्छा साधन सदा, रमती पीढ़ी थाह।
बिन शोर ही बढ़ा बहुत, अदभुत थी परवाह।।

खुद से ज्यादा और का, रखते थे जो ध्यान।
ढ़ोल पीटकर ना दिए, वांछित था जो ज्ञान।।

कम शब्द और मौन में, निहित रहा मंतव्य।
अर्जित सार समेटकर, कोशिश पाने नव्य।।

अनुशासन रचता रहा, मिलती वक्त भभूत।
खतरों को जब भांपकर, चला चले जो दूत।।

रहती आंखों में हया, सम्मान हद के पेंच।
इसी डोर दोनों सिरे, बहुत संभलकर खेंच।।

बुजुर्ग पीढ़ी देखता, वंश चरम बदलाव।
यश दौलत से कम हुआ, केवल वक्त अभाव।।

कमोबेश ही ये कथा, बनती ऐसी ढाल।
कुछ बुजुर्ग बदहाल से, टाला करें बवाल ।।

विवश युक्त ये दौर अब, करता है फरियाद।
पूछ परख में झोल है, खुद सुनता वो नाद।।

बच्चे सिर्फ दो या तीन, फिर दो की आवाज।
अब हम दो का एक ही, खूब सहेजे काज।।

कम साधन से भी सजे, जीवन एक मुकाम।
साधन सभी अपार हों, जुटते बिना लगाम।।

विकास पथ ज्यों फैलता, मिलते कई संकेत।
अलग विलग की भावना, क्यों मनमाना लेत।।

सूरत सीरत सब अलग, सबकी है पहचान।
यूं तुलना में उलझना, दिखे झलक अभिमान।।

भय अनचाहा सुलगता, भटक गए संस्कार।
नाप तौल से बोलना, भूल चुके मनुहार।।

अपनापन ही पृथक है, यदि संवाद विहीन।
नव दौर की व्यस्तता, निभता कैसे दीन।।

बाप कभी राजा रहा, कभी वंश आधीन।
ऊंचे बोल सहन नहीं, मुखर भाव प्राचीन।।

बुजुर्ग जो भी आज के, उनको लाख प्रणाम।
खाली जवाब की प्रथा, शांति का कोहराम।।

हाय! वृद्धाश्रम योजना, कैसे करें कबूल।
सक्षम बनते बाद जो, रखता बुरा उसूल।।

गुरुकुल अनादि काल में, गायब बूढ़ा लोक।
स्वाभिमान संस्कार से, तय था मिलना थोक।।

अब संवाद परंपरा, अति सहज हुई भूल।
मकसद वार्ता ही हुआ, कहना ऊलजलूल।।

शतक बुराई बाप में, समझो सब सुकुमार।
दूध धुले गर आप हैं, पर दरजा हकदार।।

जीवन अनुभव खास है,जीवित जब तक बाप।
बाल न बांका हो सके, क्या ही नापो नाप।।

दशरथ राम श्रवण के, चरित्र से अभिभूत।
जन्म उपकार ही बड़ा, हे! कलयुग के पूत।।

चाहत मन में यूं रखे, गूंजे यश आकाश।
पिता अभागा भी कहे, मेरा होता काश!।।

सब कुछ हो संसार में, धागे बंधते नेह।
अंतिम घड़ी नसीब से, सुख पाती है देह।।

परिचय :- विजय कुमार गुप्ता “मुन्ना”
जन्म : १२ मई १९५६
निवासी : दुर्ग छत्तीसगढ़

उद्योगपति : १९७८ से विजय इंडस्ट्रीज दुर्ग
साहित्य रुचि : १९९७ से काव्य लेखन, तत्कालीन प्रधान मंत्री अटल जी द्वारा प्रशंसा पत्र
काव्य संग्रह प्रकाशन : १ करवट लेता समय २०१६ में, २ वक़्त दरकता है २०१८
राष्ट्रीय प्रशिक्षक : (व्यक्तित्व विकास) अंतराष्ट्रीय जेसीस १९९६ से
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।


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