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नेता जी के टारच

राजेन्द्र लाहिरी
पामगढ़ (छत्तीसगढ़)
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(छत्तीसगढ़ी बोली)

नेताजी अड़ गे,
कहिथे हमर
सरकार आय ले
प्रदेश हर किलोमीटर
भर आघु बढ़ गे,
मय अकचका गंय,
त फेर हमन काबर
अपन जगेच म हवन,
खिसकीच नहीं काबर
हमर कुंदरा वाला भवन,
कथे तैं नइ समझे जोजवा,
तोर आंखी हेवय
नवा खोजवा,
हमर सरकार हर
घर-घर गइच हवय,
जेला जउन चीज के
जरूरत रहिच
वो हर चीज ल बांटिच हवय,
फेर मय कहेंव
तुंहर किलोमीटर
भर वाला टारच
कति कति बारे हवा,
कति के अंधियार
ल संघारे हवा?
भाषण के उजियार
ह नेताजी,
सिरिफ पोस्टर म
चकाचक दिखथे,
हमर गाँव के
नरवा-गरवा म,
आज घलो अंधियारी रेंगथे,
तुंहर बिकास ल
कोन गरुवा हुदेनथे,
कका,भतीजा,नोनी,बाबू,
जम्मो झन अइसने बेहाल हवन,
तुंहर आघु बढ़े के गोठ सुनके,
हमन अपन जगे म
थिरक आय हवन,
बतावा त अइसन
बिकास कति पाय हवन?

परिचय :-  राजेन्द्र लाहिरी
निवासी : पामगढ़ (छत्तीसगढ़)
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।

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