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गवां बैठे

प्रतिभा दुबे “आशी”
ग्वालियर (मध्य प्रदेश)

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वो ज़माने हम गंवा बैठे,
वो ख़ज़ाने हम गंवा बैठे
आज कुछ नहीं जोड़ने को,
सलीक़े पुराने हम गंवा बैठे।।

महफ़िलें तो सजी हैं आज बहुत,
पर वो हँसने के बहाने हम गंवा बैठे
ईंट-पत्थर के मकां तो बना लिए,
मिट्टी के वो घराने हम गंवा बैठे।।

जिसे ढूँढती है आज ये दुनिया,
वो सुकून-ए-दिल हम गंवा बैठे
रफ़्तार तो मिल गई है ज़िंदगी को,
ठहरने के वो ज़माने हम गंवा बैठे।।

परिचय :-  श्रीमती प्रतिभा दुबे “आशी” (स्वतंत्र लेखिका)
निवासी : ग्वालियर (मध्य प्रदेश)
उद्घोषणा : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।


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