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किताबों का रिक्शा

माधवी तारे
लंदन
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शहर की गलियों में रघु का रिक्शा रोज़ सुबह सबसे पहले दिखाई देता था। नीली पेंट उधड़ी हुई थी, पुरानी सी रिक्शा थी लेकिन थी साफ सुथरी। ऐसे ही एक दिन एक मैडम उनके रिक्शे में बैठीं। कलफ लगी, सूती लेकिन साफ साड़ी और शालीन व्यक्तित्व। मैडम ने रास्ते में रघु से बहुत बातें की, रघु सारी बातों का जवाब दे रहा था। जब मैडम नीचे उतरी तो रघु ने कहा “मैडम रुकिये, मुझे आपको कुछ देना है।” रास्ते में हो रही आध्यात्म की बातों के आधार पर रिक्शा की सीट के नीचे से उसने ईशावास्य उपनिषद पर एक किताब निकाली औऱ मैडम को दी। मैडम हैरान रह गई कि रिक्शा चलाने वाला एक साधारण, शायद अनपढ़ आदमी कितनी समझ रखता है। मैडम ने हैरानी से पूछा, आपके पास इतनी किताबें हैं? आप पढ़ते हैं …?
रघु कुछ देर चुप रहा फिर कहा, “मैडम, मैं यह सोचकर किताबें लोगों को देता हूँ कि जो पढ़ा-लिखा दिखता है, वही किताब की क़द्र करेगा। पर शायद मैं भी लोगों को देखकर ही फैसला कर रहा था- ठीक वैसे ही जैसे लोग मुझे देखकर समझ लेते हैं कि मैं बस रिक्शा ही चला सकता हूँ।” रघु ने आगे कहा, “मेरे पिता पुस्तकालय में चपरासी थे, बचपन में वहीं बैठकर पढ़ना सीखा, पढ़ाई पूरी नहीं कर पाया, पर किताबें नहीं छोड़ीं रोज़ रात को एक घंटा पढ़ता हूँ। ये किताबें सेकंड-हैंड बाज़ार से खरीदता हूँ और सोचता हूँ कि किसी के हाथ सही किताब पहुँच जाए तो रास्ता बदल सकता है।”
तभी सड़क किनारे रघु को एक मजदूर के साथ उसकी बेटी किताबों की दुकान पर नज़र टिकाए खड़ी दिखाई दी। रघु ने तुरंत सीट के नीचे से एक बच्चों की किताब उसे निकाल दे दी, बच्ची ने किताब सीने से लगा ली। उसके पिता झिझकते हुए बोले, “भैया, हम पढ़े-लिखे नहीं हैं।”
रघु मुस्कराया, “इसीलिए तो दी है. बच्ची पढ़ेगी, आपको सुनाएगी, फिर घर में कहानी आएगी।” मैडम ने यही बात अपनी सहेलियों और छात्र-छात्राओं से साझी की, फिर क्या था एक कारवां चल पड़ा, कुछ ने अपनी किताबें रघु को दी, कुछ उनसे ली। अब रघु को कभी किताबें खरीदनी नहीं पड़ती थी, ज्ञान यज्ञ में कई हाथ साथ में आ गए और रघु अब किताब वाली रिक्शा के नाम से मशहूर हो गया।

परिचय :-  माधवी तारे
वर्तमान निवास : लंदन
मूल निवासी : इंदौर (मध्य प्रदेश)
अध्यक्ष : अंतर्राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच (लन्दन शाखा)
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।


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