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जब जीवन हारने लगे, तब श्री कृष्ण का जीवन पढ़िए

अमित राव पवार
देवास (मध्य प्रदेश)
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आज मनुष्य के पास पहले से अधिक साधन हैं,लेकिन शायद पहले से कम धैर्य। उसके पास संवाद के लिए अनेक माध्यम हैं, फिर भी भीतर का
अकेलापन बढ़ता जा रहा है। छोटी-सी असफलता उसे भीतर तक हिला देती है, रिश्तों में आया मामूली तनाव उसे निराश कर देता है और जीवन की कठिन परिस्थितियों के लिए डिप्रेशन जैसे शब्द सहजता से हमारी बातचीत का हिस्सा बन गए हैं।ऐसे समय में प्रश्न यह नहीं कि कठिनाइयां क्यों आती हैं। प्रश्न यह है कि कठिनाइयों के बीच मनुष्य स्वयं को कैसे संभाले? इस प्रश्न का उत्तर हजारों वर्ष पुराना है, श्रीकृष्ण के जीवन में। श्रीकृष्ण को यदि केवल मंदिर में विराजमान भगवान के रूप में देखा जाए तो हम उनके व्यक्तित्व का एक छोटा-सा हिस्सा ही देख पाएंगे। कृष्ण को समझना है तो उनके जीवन को देखना होगा। एक ऐसा जीवन जिसमें जन्म से लेकर अंतिम समय तक परिस्थितियां उनके अनुकूल नहीं थीं, लेकिन उन्होंने कभी परिस्थितियों को अपने ऊपर शासन नहीं करने दिया। उनका जन्म उत्सव के बीच नहीं, कारागार में हुआ। माता-पिता जीवित थे, लेकिन जन्म लेते ही उनसे दूर होना पड़ा। आधी रात को पिता वसुदेव उन्हें लेकर यमुना पार करते हैं और गोकुल पहुंचाते हैं। जिस उम्र में एक बालक को माता-पिता की गोद चाहिए, उस उम्र में कृष्ण का जीवन सुरक्षा और संघर्ष की कहानी बन चुका था।

गोकुल में उन्हें यशोदा का वात्सल्य मिला, नंदबाबा का स्नेह मिला और मित्रों के साथ खेलने का अवसर मिला। लेकिन वहां भी उनका बचपन सामान्य नहीं था। पूतना से लेकर कालिया नाग तक अनेक संकट उनके सामने आए। बालक कान्हा (श्री कृष्ण) हर संकट के बाद फिर मुस्कुराते दिखाई देते हैं। यह मुस्कान साधारण नहीं है। यह हमें बताती है कि जीवन में संकट का आना हमारे हाथ में नहीं, लेकिन संकट के समक्ष हमारी प्रतिक्रिया हमारे हाथ में हो सकती है। श्रीकृष्ण के बाल्यकाल को हम प्रायः माखन, बांसुरी, गोपियों और रास की कथाओं तक सीमित कर देते हैं। लेकिन इन प्रसंगों के पीछे छिपे बाल-सुलभ आनंद, स्नेह और जीवन की सहजता को समझने की आवश्यकता है। श्रीकृष्ण का व्यक्तित्व हमें बताता है कि गंभीर जिम्मेदारियों के बीच भी जीवन से आनंद को समाप्त नहीं किया जाना चाहिए। फिर एक दिन वही कृष्ण गोकुल छोड़ देते हैं। जिस भूमि ने उन्हें बचपन दिया, जिन मित्रों ने उनके साथ खेला, जिस माखन से उनका बाल-स्नेह जुड़ा रहा और जिन संबंधों में उनका भावनात्मक संसार बसता था सब पीछे छूट गया। सोचिए, जिसके लिए गोकुल पूरा संसार था, उसे उसी संसार से विदा होना पड़ा।

आज हम नौकरी, व्यवसाय या शिक्षा के लिए अपना शहर छोड़ते हैं तो घर की याद आती है। कृष्ण ने तो अपने बचपन का संसार ही पीछे छोड़ दिया। लेकिन उन्होंने पीछे मुड़कर अपने जीवन को रोका नहीं। आगे बढ़े, क्योंकि समय उनसे नई भूमिका की मांग कर रहा था। मथुरा में कंस का अत्याचार समाप्त किया। आगे जीवन उन्हें द्वारका तक ले गया। राज्य, समाज, राजनीति और सुरक्षा की जिम्मेदारियां उनके सामने आती गईं। एक ऐसा व्यक्ति जो स्वयं राजा था, उसे भी लगातार निर्णय लेने पड़े।
और फिर आया कुरुक्षेत्र। कुरुक्षेत्र में अर्जुन का संकट आज के मनुष्य के संकट से बहुत अलग नहीं था। उसके सामने निर्णय था, लेकिन मन निर्णय लेने की स्थिति में नहीं था। संबंध सामने थे, भावनाएं सामने थीं और कर्तव्य दूसरी ओर खड़ा था। अर्जुन का गांडीव नीचे गिर गया। वह युद्ध से पीछे हटना चाहता था। तब श्रीकृष्ण ने उसे केवल युद्ध का उपदेश नहीं दिया। उन्होंने उसे जीवन को देखने की दृष्टि दी। यही भगवद्गीता का सार है। मनुष्य का अधिकार अपने कर्म पर है, उसके परिणाम पर नहीं। परिणाम की चिंता में यदि कर्म ही छूट जाए तो जीवन का उद्देश्य कमजोर पड़ जाता है। और देखिए कृष्ण का अपना आचरण। वे स्वयं शस्त्र उठाकर युद्ध करने के बजाय अर्जुन के सारथी बनते हैं। एक राजा का सारथी बनना अपने आप में संदेश है। आज जिस समाज में पद और प्रतिष्ठा के आधार पर काम को छोटा-बड़ा समझा जाता है, कृष्ण बताते हैं कि काम की गरिमा उसके पद में नही, उसके उद्देश्य और निष्ठा में होती है। कृष्ण चाहते तो अपनी शक्ति से युद्ध का परिणाम बदल सकते थे। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। उन्होंने मनुष्य को उसकी जिम्मेदारी स्वयं निभाने दी। यही कृष्ण की सबसे बड़ी विशेषता है। वे मनुष्य को निर्भर नहीं, सक्षम बनाते हैं। उनके जीवन में केवल विजय नहीं थी। उन्होंने वियोग देखा, मृत्यु देखी, युद्ध देखा, अपने प्रियजनों को खोया और अंततः अपने ही वंश के भीतर उत्पन्न विनाश को भी देखा। फिर भी उन्होंने जीवन के प्रति अपना संतुलन नहीं खोया। यही कारण है कि आज श्रीकृष्ण को पढ़ने की आवश्यकता केवल धार्मिक आस्था के कारण नहीं, बल्कि जीवन को समझने के लिए भी है।

आज युवा असफलता से डरता है। नौकरी न मिलने पर टूटता है। संबंध टूटने पर बिखर जाता है। अपेक्षाएं पूरी न होने पर स्वयं को असफल मान लेता है। ऐसे समय में श्रीकृष्ण का जीवन कहता है, तुम्हारी एक असफलता तुम्हारा पूरा जीवन नहीं है। एक परिस्थिति तुम्हारी पूरी पहचान नहीं है। दुःख आएगा, लेकिन दुःख ही अंतिम सत्य नहीं है। वियोग होगा, लेकिन जीवन वहीं समाप्त नहीं होता। असफलता मिलेगी, लेकिन कर्म का मार्ग बंद नहीं होता। और जब मन भ्रमित हो जाए, तब अपने कर्तव्य को पहचानना ही आगे बढ़ने का पहला कदम है। इसलिए श्रीकृष्ण को केवल जन्माष्टमी के दिन स्मरण करना पर्याप्त नहीं। उन्हें जीवन की कठिन घड़ियों में याद करना अधिक आवश्यक है। जब मनुष्य के सामने विकल्प बहुत हों और निर्णय कठिन हो तब, श्री कृष्ण को पढ़िए। जब परिणाम की चिंता कर्म से बड़ी हो जाए, कृष्ण को पढ़िए। जब असफलता स्वयं पर विश्वास कम करने लगे, कृष्ण को पढ़िए। जब संबंधों का वियोग भीतर से तोड़ने लगे, कृष्ण के जीवन को देखिए। क्योंकि कृष्ण का जीवन हमें यह नहीं कहता कि तुम्हारे जीवन में दुःख नहीं आएगा। वे कहते हैं दुःख आएगा, लेकिन तुम्हें अपने कर्म से विमुख नहीं होना है। शायद इसी संदेश की आज सबसे अधिक आवश्यकता है। श्रीकृष्ण जीवन से पलायन का दर्शन नहीं देते। वे जीवन के बीच खड़े होकर जीवन को साधने की कला सिखाते हैं।

इसलिए वे केवल गोकुल के नटखट कान्हा नहीं हैं,केवल द्वारका के राजा नहीं हैं और केवल कुरुक्षेत्र के सारथी भी नहीं हैं। वे योगेश्वर श्रीकृष्ण हैं, जो हजारों वर्ष बाद भी मनुष्य से कहते प्रतीत होते हैं कि परिस्थिति चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हो, अपने कर्म, विवेक और धर्म का हाथ मत छोड़ो। क्योंकि जीवन की सबसे बड़ी जीत कठिनाइयों का समाप्त हो जाना नहीं, बल्कि कठिनाइयों के बीच स्वयं को बचाए रखना है। यही कृष्ण हैं। यही उनका जीवन-संदेश है।
जय श्री कृष्ण….

परिचय :-  अमित राव पवार
निवासी : देवास (मध्य प्रदेश)
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।

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