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नारद मोह

हंसराज गुप्ता
जयपुर (राजस्थान)

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*दोहा*
नारद के मन में जगा,
गर्व जनित अज्ञान।
माया रची श्रीनाथ ने,
हरने को अभिमान।।
मदन मथि मद मत्त मुनि,
मानी मन महारा।
सिव की सीख बिसारि कै,
बढ़े बैकुंठ बिराज।।

*सवैया*
भक्त, भयंकर-भाव भरे मन,
भगवन को निज भेद सुनावैं।
काम कठिन करि कामुक कौतुक,
किंचित कलेस न कोउ करावैं।
मन ही मन मुसकाय मुरारी,
मूरख मुनि को मान मिटावैं।
मारग माँय महामाया से,
मोहमयी नगरी महकावैं।।

*दोहा*
शीलनिधि की बाला सुंदर,
बिस्वमोहिनी नाम।
रेख निरखि रमणी रतन,
मुनि मन उपजा काम।।

*सवैया (पहला भाग)*
देखत रूपहि नारद मोहित,
सुंदर मोहक छवि अति न्यारी।
रमणी रमण, रूप रस राते,
नैनानंदिनी नारि निहारी।
धाम धरापति धाय धरे पग,
देहु दयामय मोहि मुरारी।
मांगत रूपहि श्रीहरि सों मुनि,
देव-छवि रवि सों अति भारी।।

*सवैया (दूसरा भाग)*
जैसो जगत्पति जीति जगत् को,
सुंदर साँवरि सूरत सारी।
हरि कहि, हरि तब, हरि-मुख दीन्हों,
बानर बदन बनाय बिहारी।
मरकट-आनन दीन्हा मुनीशहिं,
देत भयंकर न बात विचारी।
गरब समेत गए मुनि मंडप,
जान ना पावत रूप विकारी।।

*दोहा*
हर्षित मन नारद मुनि,
पहुँचे प्रभु पद पाय।
बानर बदन बिलोकि कै,
सकल सभा सकुचाय।।

*दोहा (शिव गणों का उपहास)*
बिप्र बेष शिवगण तहाँ,
गहि मन गूढ़ गुमान।
मर्कट मुख मुनिहिं रमत,
हँसत करत गुणगान।।

*सवैया*
मंचहि नारद अभिमान मगन,
छबि छैला छबिकाय निहारें।
बाला बरनि बिलोकत बानर,
देखि दसा दरसाय दुत्कारें।
पेखि प्रभा प्रभु पद्म-नयन की,
माला मुदित मुरारि पहिरावैं।
क्रोध कराल करैं कपि-आनन,
साप सकोप सुसंत उचारैं।।

*दोहा*
गये गरुड़-गामी सँग रमणी,
शिवगन गिरा गिराई गूढ़।
नीर निरखि निज नयनन मुनिवर,
मर्कट मुखहिं, बिलोकहु मूढ़।।

*दोहा*
नीर निहारि निज नैनन में,
बानर बदन बिसाल।
कोप कराल कठोर कपि,
भभके भृकुटि उर भाल।।

*सवैया*
गर्जत घोर गिरा गहि गोसाईं,
गूढ़ गरब गन को गहिरावैं।
बिप्र बेष धरि बंचक बैठे,
बानर बदन बिलोकि बिहँसावैं।
राछस रूप धरौ, दुहुँ मूरख,
रुच्छ रुदन रन-भूमि रुलावैं।
दानव देह दसा दुखदायिनी,
दारुन दनुज दर्प दरसावै।।

*सवैया*
क्रोध कराल करैं कपि-आनन,
कंपत काया कलेजा कपावैं।
धाय गए धरणीधर हरि के,
धोखा धरौ, धरती धमकावैं।
मायामयी, मरजाद मिटाय कै,
मोहिं मरकट मूढ़ बनावैं।
छल छंद छिपाय छली छलिया,
छबि छीनि, छिमा नहिं, छाती जुड़ावै।।

*दोहा*
नारि निरास, निरादर नारद,
साप सकोप सुनाय।
बन बन बिरह बिथा बढ़े,
बानर बनहिं सहाय।।

*सवैया*
तीय तजी, तरपैं तन में,
तुम तोहिं तिया तहँ ताप तपावैं।
मानव व्है, माटि में माथ मले,
मग माझ महा मति मारग जोवैं।
बानर बेस बनाय दियो मोहिं,
बानर ही बन बंधु कहावैं।
दीन दयालु दसा दुखिया,
सु दसा दसकंठ दलन दरसावै।।

*दोहा*
हरि हँसि हीय हरषाय कै,
माया लीन्ही हटाय।
नारद नत, नत-मस्तक भये,
चरन चरन चित लाय।।

*सवैया*
पाप प्रबल, प्रभु पाहि प्रभू,
पद-पंकज पूजत, पाप नसावैं।
मोह महा मद मत्त मुनी,
महिमा मन मांहि मलीन गवाँवैं।
दीन दयालु दया दरिया,
दुख दरद, दूर, दुखिया दुलरावैं।
गावत गिरा, गोबिंद गुन,
गरुड़ासन-गीत गगन गहरावैं।।

*दोहा*
हरि माया अति दुस्तरै,
लखै न मुनि मति-धीर।
‘हंस मधु’ भजि राम पद,
मिटै सकल भव-पीर।।

परिचय :-  हंसराज गुप्ता, ‘अग्रवाल’ पूणीवाला, लेखाधिकारी
निवासी : अजीतगढ़ (सीकर) राजस्थान
घोषणा पत्र : प्रमाणित किया जाता है कि रचना पूर्णतः मौलिक है।


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