
हंसराज गुप्ता
जयपुर (राजस्थान)
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अनुप्रास तुम्हारे बैनन में है,
सैनन से गहरा त्रास प्रिये.
मधुमासों की जननी हो तुम,
प्रिय वसंत की निर्झरिणी
शांत हृदय की मंद रागिनी,
भ्रांतमना सुरमयी तरुणी
मिलन मिठास है प्रिय प्रवास,
बिछुड़े मिलने की आस प्रिये,
अनुप्रास तुम्हारे बैनन में,
सैनन से गहरा त्रास प्रिये,
बदन जलाती कड़ी धूप में,
सुख उपजाती शीतल छाया
सावन का आवन मनभावन,
नीर तुम ही ने बरसाया
जन्मों-जन्मों की आज मिटादो,
अन्तर में गहरी प्यास प्रिये
अनुप्रास तुम्हारे बैनन में,
सैनन से गहरा त्रास प्रिये
झलका मधुमय धवल चन्द्र,
शारद निर्मल आह्वान प्रिये
चुनने दो हंसा को मोती,
रख लो मानस का मान प्रिये
मधुर मधु मधुकर अवलम्बन,
नित ज्योति का उत्थान प्रिये
धवल खीर है नवल चांदनी,
हो जाये अमृतपान प्रिये
बनकर खिलता सुर्ख गुलाब,
पूरो अन्तिम अभिलाष प्रिये
अनुप्रास तुम्हारे बैनन में,
सैनन से गहरा त्रास प्रिये
पौध लगाकर जल देने से,
फूल-बगर खिल जाते हैं
दैव भाग्य अनुकूल, रुत में फल,
पल्लू भर मिल जाते हैं
ढलक रहा है मधुर-मधु, इन
अधरों से मकरंद प्रिये
आज हटा लो पट झटपट,
अब पीने दो स्वच्छंद प्रिये
देखे नयनन उल्लास जगे,
छूकर तन को विश्वास प्रिये
अनुप्रास तुम्हारे बैनन में,
सैनन से गहरा त्रास प्रिये
सुध-बुध खोकर, भेद मिटा दो,
हो जाओ एकाकार प्रिये
सुरभित पराग, अनुराग हिये में,
अब आवेदन उद्गार प्रिये
मधुकर की सुरभित श्वासों में,
है अमर प्यार के छंद प्रिये
हर जन्म यही गठबंधन हो,
और शतकों का अनुबंध प्रिये
तुम लहरों की महारानी हो,
मैं लहरों का दास प्रिये,
अनुप्रास तुम्हारे बैनन में,
सैनन से गहरा त्रास प्रिये,
सुख चैन लुटाती रैनन में,
नित नैनन में उल्लास लिये.
प्रहर प्रहर मधु ज्योति जगाती,
परस सरस आभास हिये.
अनुप्रास तुम्हारे बैनन में,
सैनन से गहरा त्रास प्रिये
परिचय :- हंसराज गुप्ता, ‘अग्रवाल’ पूणीवाला, लेखाधिकारी
निवासी : अजीतगढ़ (सीकर) राजस्थान
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