
सूर्यपाल नामदेव “चंचल”
जयपुर (राजस्थान)
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अनजान राहों का हूँ मुसाफिर,
मुझसे बेहतर कौन जानता।
पड़ावों से गुजरा हूँ अब तलक,
मंजिल का ठिकाना कौन जानता।।
हर मोड़ पर इक कहानी छूटी,
हर गाँव में इक नाम छूटा,
जो साथ चले थे सफर में,
उनका अफसाना कौन जानता।
धूल सनी है पगडंडियाँ,
और पाँवों में छाले हैं,
इन राहों में कितना दर्द है,
ये राही बेचारा कौन जानता।
शाम ढले तो याद आते हैं,
वो अपने छूटे मकान,
परदेस में ये दिल अकेला,
कितना तड़पा कौन जानता।
लोग पूछते हैं कहाँ तक जाना,
किस शहर में है ठिकाना,
मैं हँस के कह देता हूँ यारों,
अगला पड़ाव कौन जानता।
थक कर जो बैठा हूँ जरा,
तो लगता है घर पास है,
फिर सुबह होते ही चल दूँ,
ये दिल दिवाना कौन जानता।
सफर ही मेरा घर है,
और चलना ही मेरी पूजा,
रुक जाऊँ तो मर जाऊँ,
इस राज़ को सारा कौन जानता।
इसीलिए चलता जा रहा हूँ,
अनजान राहों का मुसाफिर,
कल कहाँ होऊँगा मैं,
ये तो खुदा के सिवा कौन जानता।।
शिक्षा : एम ए अर्थशास्त्र , एम बी ए ( रिटेल मैनेजमेंट)
व्यवसाय : उद्यमी, प्रबंधन सलाहकार, कवि, लेखक, वक्ता
निवासी : जयपुर (राजस्थान) ।
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