
मनमोहन पालीवाल
कांकरोली, (राजस्थान)
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कहा छिपे हो मोरे कान्हा,
होरी खेलो रे
होरी खेलो रे ….(२)
कान्हा होली खेलो रे …(२)…
चार कोस मे चल कर आई
कहां छिपे होरे
कान्हा कहा छिपे होरे
पिचकारी लाओ रंग उराओ ।
होरी खेलो रे
होरी खेलो रे
कान्हा होली खेलो रे …(२)…
लाज शरम सब छोड़, आई
पीचकारी लाई रे
पीचकारी लाई रे
कहां छिपे हो मोरे कान्हा
पीचकारी लाई रे……।
तोहरे रंग मे रंगने आई
कहां छिपे हो रे
कहां छिपे हो रे
होली खेलो रे …..
होली खेलो रे नंदलाला, होली खेलो रे (२)…
सास ससुर सु बचकर आई
होली खेलो रे
होली खेलो रे
होली खेलो रे नंदलाला होली खेलो रे
चूड़ी टूटी चोली भीगी
ओर भीगे सब अंग
ओर भीगे सब अंग
जम कर रंग उड़ाओ कान्हा
बचन पाए कोई रंग
बचन पाए कोई रंग
इतना ड़ारो रंग की मुझ पर
दिखे न कोई अंग
दिखे न कोई अंग।
कहां छिपे हो मोरे कान्हा
खेलो मोरे संग
खेलो मोरे संग
रात सपन मे तुम जो आए
रात जगाई रे
रात जगाई रे
मोरी नीद चुराई रे
मोरी नींद चुराई रे
आ कर देखो
बचते बचाते, भागी भागी आई रे
कहां छिपे हो मोरे कान्हा
कहां छिपे हो रे
होली खेलो रे………..।
कुंज गलिन मे ढ़ूढ रही हूं
श्याम सखा संग तोहे
श्याम सखा संग तोहे
एक झलक दिखा दे मोहे
अब क्यूं तरसावे
कहां छिपे हो मोरे कान्हा
होरी खेलो रे
होरी खेलो रे……(२)
कान्हा होरी खेलो रे ….(२)
परिचय :- मनमोहन पालीवाल
पिता : नारायण लालजी
जन्म : २७ मई १९६५
निवासी : कांकरोली, तह.- राजसमंद राजस्थान
सम्प्रति : प्राध्यापक
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।
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