
गीता देवी
औरैया (उत्तर प्रदेश)
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जहां पनघट पर गांव की,
बालाओं को चढ़ते देखा था।
जहां खेत जाते किसानों को,
हल चलाते देखा था।।बरगद के पेड़ के नीचे जहां,
चौपाल लगाई जाती थी।
और फैसला होने पर,
बात पंचों की मानी जाती थी।।जहां गन्नों के खेतों में,
कोल्हू से रस निकलता था।
मीठे गुड़ की खुशबू से,
तब वातावरण महकता था।।हर घर का आंगन भी,
मां तुलसी से सुशोभित था।
जहां ढोलक और मजीरों पर,
स्त्रियों का संगीत गूंजता था।।छोटे-छोटे बच्चों को दादी,
नानी की कहानी में लगाव था।
गायें थी हल था अलाव था,
वही मेरा गांव था।।और यहां प्रदूषण फैलाती हुई,
बसें हैं कारें हैं टैक्सी हैं।
चौराहे दर चौराहे पर ,
भीड़ भरी गैलेक्सी है।।नल है कल है कारखाने हैं,
इंसान का इंसान से कोई नहीं
रिश्ता है,
मशीनों में जीता है
मशीनों में पिसता है।।हर घर में टीवी है मोबाइल है,
पंखे में बिजली हैं।
नालियों में गंदा पानी है,
प्रदूषित हवा ही मिलती है।।धूल है धूप है,
धुएं का ज़हर है।
यही मेरा शहर है।।
पिता : श्री धीरज सिंह
निवासी : याकूबपुर औरैया (उत्तर प्रदेश)
रुचि : कविता लेखन, चित्रकला करना
शैक्षणिक योग्यता : एम.ए. संस्कृत बीटीसी,
सम्प्रति : बेसिक शिक्षा परिषद में कार्यरत, प्राथमिक विद्यालय मल्हौसी बिधूना, औरैयादिल्ली
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