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घर में पधारो गजानन

प्रभा लोढ़ा
मुंबई (महाराष्ट्र)
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खड़ी हूँ द्वार पर राह तकती तुम्हारी,
घर में पधारो गजानन महाराज,
घर को बुहारा चंदन की
ख़ुशबू बिखेरी हर दिशा में,
पीले-पीले फूलों का बनाया तोरण,
तुम्हें अर्पण करने थाल
सजाये नवैघ और मोदक से
धुप दीप प्रज्वलित कर
राह निहारती तुम्हारी,
एक दंत महाकाय
रुप है निराला,
तुम हो संकट हरण
करते सबकी विपदाएँ दूर,
तुम्हारा मानव है घबराया
महामारी करोना ने
सबको है डराया,
आकर सँभालो
इस विपदा को दूर करो
संकटमोचन गणपति,
धरती पर हाहाकार
मचा हुआ
इस संकट का करो निवारण
सब राह तकते
अब तो आजाओ
रुप तुम्हारा है निराला
सबको बहुत सुहाता
घर में पधारो
गजानन महाराज ।

परिचय :- प्रभा लोढ़ा
निवासी : मुंबई (महाराष्ट्र)
आपके बारे में : आपको गद्य काव्य लेखन और पठन में रुचि बचपन से थी। आपने दिल्ली से बी.ए. मुम्बई से जैन फ़िलोसफी की परीक्षा पास की। आप गृहणी की भुमिका निभाते हुए कई संस्थाओं में सक्रिय है। आपकी समाज सेवा, धार्मिक कार्य, असहाय बच्चे व महिला शिक्षा में विशेष रुचि है। आपकी जीवन यात्रा, उड़ान, उमंग ये तीन स्वरचित काव्य संकलन प्रकाशित हुईं। कॉफ़ी-टेबल बुक माँ, और हेपी ६५वां बर्थडे दो किताबें प्रकाशित हुई। शिक्षा घर घर पहुँचे यह आपका स्वप्न है।
घोषणा पत्र : मेरे द्वारा यह प्रमाणित किया जाता है कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है।


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