
डॉ. प्रताप मोहन “भारतीय”
ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी
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जितना अगूंठा हमारा फोन पर चलता है, अगर उतना माला पर चले तो हमें भगवान अवश्य मिलेंगे। ‘भला करने से भला होता है’ इस कहावत से तो मेरा विश्वास ही उठ गया है, क्योंकि मैं अपनी प्रेमिका को डेयरी मिल्क, फाईव स्टार और फिर किट-कैट देता था। उसी प्रेमिका से मेरी शादी हो गयी। अब वो मुझे टिफिन में टिंडे, लौकी और करेले दे रही है। लोग अपने मोबाईल पर डी.पी. लगाते हैं। डी.पी.- मतलब दिखावटी फोटो। एक लड़की कह रही थी मैं बचपन में बहुत ताकतवर थी। मैंने पूछा- तुम्हें कैसे पता ? उसने कहा- मेरी मम्मी कहती है जब मैं रोती थी तो पूरा घर सिर पर उठा लेती थी।
हमें भगवान और डॉक्टर को कभी नाराज नहीं करना चाहिए, क्योंकि जब भगवान नाराज होता है तो डॉक्टर के पास भेजता है और जब डॉक्टर नाराज होता है, तो वो भगवान के पास भेज देता है। जब कोई बटोरने की जगह बाँटने लगे तो समझ जाइए उसे ज़िंदगी की असलियत पता लग गई है, क्योंकि सब यहीं रह जाएगा। मनुष्य का असली चरित्र जब सामने आता है जब वो नशे में होता है, फिर वो नशा धन का हो, रूप का हो, पद का हो या शराब का हो। हरियाणे के ताऊ का भी जवाब नहीं। मरने वाला था- घरवालों ने कहा- मरने वाले हो, अब तो भगवान नाम ले लो, तो ताऊ बोला-अब नाम क्या लेना, १०-१५ मिनट बाद तो आमना-सामना हो ही जाएगा।
चुप रहना भी एक कला है, जो सिर्फ उन्हीं को आती है, जो समझते हैं कि उत्तर हर बात का नहीं, सिर्फ जरूरत का दिया जाता है। मैं किराए के मकान में रहता था। एक बार मैंने अपने मकान मालिक को शेयर मार्केट के बारे में बताया। अब हम दोनों किराए के मकान में रहते हैं। हमें टेंशन उतनी ही लेना चाहिए, कि काम हो जाए; इतनी नहीं कि ज़िंदगी झंडुबाम हो जाए। आज तो शराफत की हद हो गयी, एक लड़की मुझे कहने लगी- आप बहुत अच्छी पोस्ट डालते हो, कहीं आप पोस्टमैन तो नहीं हो।
औरतें एक बार में नहीं सुनती है, इसलिए शायद कुकर में ३-४ सीटियाँ बजती है। लोग कहते हैं कि कि वक़्त बदलता है और वक़्त ने बताया कि इंसान भी बदल जाते हैं। बड़ा अजीब है जमाना, जब समय खराब होता है तो लोग हाथ नहीं, गलतियाँ पकड़ते हैं। दुश्मन बनाने के लिए जरूरी नहीं है, कि आप लड़ाई ही करें, बस अपने हक़ का और सच बोलें। बेशुमार दुश्मन आपके खानदान में मिल जाएंगे। अजीब है लोग यहाँ पर मतलब की बात सब समझ लेते हैं, लेकिन बात का मतलब बहुत कम लोग ही समझ पाते हैं।
शादी में कुँवारे और शवयात्रा में बूढ़े लोग ज्यादातर इसलिए जाते हैं कि अगर हम नहीं जाएंगे तो हमारी में कौन आएगा ? बुढ़ापे में मुझे जरूरत पड़ने लगी है चश्मे की, क्योंकि लोगों के धोखे अब ठीक से नजर नहीं आते। वक़्त पर पसीना बहा लेना चाहिए, वरना बाद में आँसू बहाना पड़ेंगे। ज़िंदगी में हिसाब रखना जरूरी है, आजकल लोग बड़ी जल्दी पूछ लेते हैं। पहले लोग झूठ बोलने से डरते थे, कि गुनाह होगा और अब लोग सच बोलने से डरते हैं कि नुकसान होगा। आज तक मैं समझ नहीं पाया कि लोग सर की ही कसम क्यों खाते हैं। नाक, कान, मुँह, फेफड़े, ये सब भी तो कीमती हैं। फिल्मों में शादी हो जाए तो तो फिल्म पूरी हो जाती है और हमारे यहाँ शादी हो जाए तो फिर फिल्म शुरू होती है। किस उम्र तक पढ़ा जाए, किस उम्र से कमाया जाए; ये शौक नहीं हालात तय करते हैं। सर्दियों में सूरज का व्यवहार भी सरकारी दफ्तर के बाबू के समान हो जाता है, सुबह देर से आता है और शाम को जल्दी चला जाता है।
मत बनो शीशा, हमेशा फोड़े जाओगे, बनो पत्थर हमेशा पूजे जाओगे।
परिचय : डॉ. प्रताप मोहन “भारतीय”
निवासी : चिनार-२ ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी
घोषणा : मैं यह शपथ पूर्वक घोषणा करता हूँ कि उपरोक्त रचना पूर्णतः मौलिक है।
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