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बाहर फागुन बौराया है

विशाल त्रिवेदी “अल्पज्ञ”
सेंधवा (मध्य प्रदेश)
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बाहर फागुन बौराया है,
मलय-पवन लहराती है
पर भीतर की अगन अनकही,
पल-पल मुझे जलाती है
रंगों की इस भीड़-भाड़ में,
मैं तनहा खड़ा रहूँ
निगाहों में जलती इस होली का,
बोलो अब क्या करुँ?

यादों की समिधा सुलगी है,
नयनों के इस कुंड में
धुआँ-धुआँ सा हुआ जा रहा,
मैं सपनों के झुंड में
भीग रही है दुनिया सारी,
केसरिया बौछार से
मैं अपनी रुलाई को अब,
हँस कर कैसे सहूँ?

निगाहों में जलती इस होली का,
बोलो अब क्या करुँ?
अबीर गुलाल उड़ाते चेहरे,
लगते हैं सब बेगाने
मौन खड़ा हूँ अधरों पर मैं,
लिए हज़ारों अफ़साने
कोरे रह गए मन के पन्ने,
बिन तेरे अनुराग के
राख हुए इन अहसासों को,
कब तक चुनता रहूँ?
निगाहों में जलती इस होली का,
बोलो अब क्या करुँ?

परिचय :- . विशाल त्रिवेदी “अल्पज्ञ”
निवासी : सेंधवा (मध्य प्रदेश)
सम्प्रति : व्यावसायिक रूप से एक अध्यापक के रूप में कार्यरत।
साहित्य सेवा : आप विगत ३० वर्षों से अधिक समय से साहित्य सेवा में संलग्न हैं। एक वरिष्ठ साहित्यकार और वर्तमान में सेंधवा काव्य मंच के संयोजक हैं। आप ‘अल्पज्ञ’ और ‘आदिल’ नाम से लेखन करते हैं।
साहित्यिक पृष्ठभूमि एवं कार्य
प्रारंभिक लेखन : आपने अपने अध्यापन काल से ही साहित्य साधना में रुचि ली और विभिन्न समाचार पत्रों तथा प्रतिष्ठित पत्रिकाओं जैसे कादंबिनी एवं हंस में नियमित रूप से लेखन किया। भारतीय छंद शास्त्र के अध्येता होने के साथ-साथ आप छंदमुक्त कविताओं की रचना भी करते हैं।
प्रकाशन : वर्ष १९९९ में आपका काव्य संग्रह ‘संवेदना’ प्रकाशित हुआ। इसी वर्ष, भजनों का संग्रह ‘माता है दाता’ (माता बड़ी बिजासन की महिमा पर आधारित) भी प्रकाशित हुआ।
विविध विधाएँ : आप गीत, कविता, तथा गज़लों का लेखन कर रहे हैं। इसके अतिरिक्त, आपने विद्यार्थियों के लिए नुक्कड़ नाटक तथा बाल गीतों का भी सृजन किया है।
प्रसारण एवं संगोष्ठियाँ : आपकी कविताओं का प्रसारण आकाशवाणी, इंदौर द्वारा किया जा चुका है। उज्जैन में अध्यापन काल के दौरान आपने कालिदास अकादमी की साप्ताहिक संगोष्ठियों में नियमित रूप से काव्य पाठ किया।
संपादकीय अनुभव : आपने सेंधवा महाविद्यालय की वार्षिक स्मारिका में संपादक के रूप में भी कार्य किया है।
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।


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