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प्रेम-कुमुदिनी

मीना भट्ट “सिद्धार्थ”
जबलपुर (मध्य प्रदेश)
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आग लगी तन मन में प्रियतम,
व्याकुल उर मधुमास में।
करें भ्रमर किलकारी उपवन,
पागल हैं उल्लास में।।

कली-कली मदमाती साजन,
गंधिल भी हर डाल है।
सम्मोहित करता वसंत है,
आह्लादित सुर ताल है।।
बहे प्रेम की मधुशाला तन,
पिया मिलन की आस में।
करें भ्रमर किलकारी उपवन,
पागल हैं उल्लास में।।

कंपित होते अधर हमारे,
विरहाकुल हर रात है।
नैन -प्रतीक्षा करते साजन,
स्वप्न जगे क्या बात है।।
बौराती है प्रेम- कुमुदिनी,
सखियों के परिहास में।
करें भ्रमर किलकारी उपवन,
पागल हैं उल्लास में।।

कुंतल की वेणी मुरझाई,
चन्द्र वदन भी पीत है।
खोया रंग कपोलों ने भी,
रूठा दर्पण मीत है।।
खड़ी द्वार बस अगवानी को,
आने के विश्वास में।
करें भ्रमर किलकारी उपवन,
पागल हैं उल्लास में।।

नैनों से निर्झर झरते हैं,
चुप पायल झंकार भी।
झूठी मधुर कल्पनाएँ सब,
रति अनंग मनुहार भी।।
प्रीति चकोरी सुधबुध भूली,
वृंदावन के रास में।
करें भ्रमर किलकारी उपवन,
पागल हैं उल्लास में।।

परिचय :- मीना भट्ट “सिद्धार्थ”
निवासी : जबलपुर (मध्य प्रदेश)
पति : पुरुषोत्तम भट्ट
माता : स्व. सुमित्रा पाठक
पिता : स्व. हरि मोहन पाठक
पुत्र : सौरभ भट्ट
पुत्र वधू : डॉ. प्रीति भट्ट
पौत्री : निहिरा, नैनिका
सम्प्रति : सेवानिवृत्त जिला न्यायाधीश (मध्य प्रदेश), लोकायुक्त संभागीय सतर्कता समिति जबलपुर की भूतपूर्व चेयरपर्सन।
प्रकाशित पुस्तक : पंचतंत्र में नारी, काव्यमेध, आहुति, सवैया संग्रह, पंख पसारे पंछी
सम्मान : विक्रमशिला हिंदी विश्वविद्यालय द्वारा, विद्या सागर और साहित्य संगम संस्थान दिल्ली द्वारा, विद्या वाचस्पति की मानद उपाधि, गुंजन कला सदन द्वारा, महिला रत्न अलंकरण, राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर द्वारा “उत्कृष्ट न्यायसेवा अंतर्राष्ट्रीय सम्मान २०२४” से सम्मानित तथा कई अन्य साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।


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