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होली का गुलाल

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी
लखनऊ (उत्तर प्रदेश)
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होली का एक रत्ती भर
गुलाल का रंग
जो घरों में रहने वाले
वृद्ध के माथे पर नहीं सजा
वो गुलाल, रंगहीन हो जाता है!

वृद्ध होते-जन के
लटकते चेहरे देखकर
लगता है मानो वो जप कर रहे,
रंगोत्सव में लीन नहीं होते,
क्योंकि उनके परिजन उनसे
कोसों दूर चले गए होते हैं !

आंगन में बँधी गाय
और बकरियों की
खुली खूंटी ये बताती है कि,
इस आंगन की बेटियाँ
खूंटी से बहुत दूर चली गई हैं,
यदा कदा ही दिखती हैं !

किसी जानवर के
रंगों में डूबे चेहरे
और उसकी दर्दनाक बेचैनी,
सारी खुशियों को
मलिन कर जाते हैं ,
ये सोच कर की क्या
इनके लिए खुशी नहीं बनी ??

दूर किसी मंदिर में
कीर्तन बजता है
लगता है कोई
सोहर गीत गा रहा हो,
साँझ ढले किसी
पँछी की आवाज
लगता है मानो कोई
अपना दर्द बयान कर रहा है !

घर के आंगन में कहीं
कोई हिसाब-किताब
चल रहा होता है
दुःख का बोझ और
सुख की लाठी का,
बेरंग रंगों से सुख-दुख अपना
हिसाब मांग रहे होते हैं!

मेरे साथ मेरी बुढ़ी
अम्माँ-बाबा होते हैं
बाकी सब अपना
आंगन छोडकर
अपने-अपने रास्ते
निकल गए होते हैं!

होली के कितने रंग होते है-
खुशी, प्रेम, करुणा, दया,
स्नेह, सारे रंग फीके पड़ जाते हैं
जब वृद्ध होते चेहरे
पर गुलाल नहीं सजता
वो अपने हिस्से के उदास
रंगों को खुद ही ढो रहे होते हैं!!

परिचय :- श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी
पति : श्री राकेश कुमार चतुर्वेदी
जन्म : २७ जुलाई १९६५ वाराणसी
शिक्षा : एम. ए., एम.फिल – समाजशास्त्र, पी.जी.डिप्लोमा (मानवाधिकार)
निवासी : लखनऊ (उत्तर प्रदेश)
सम्मान : राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर द्वारा “जीवदया अंतर्राष्ट्रीय सम्मान २०२४” से सम्मानित
विशेष : साहित्यिक पुस्तकें पढ़ने के शौक ने लेखन की प्रेरणा दी और विगत ६-७ वर्षों से अपनी रचनाधर्मिता में संलग्न हैं।
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।


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