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बसंत के दिन

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी
लखनऊ (उत्तर प्रदेश)
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तुम्हें देती हूँ
बसंत के दो दिन
क्या अपने हाथों की लकीरों
से थोड़ी सी दूब मुझे दोगे,
जिसको रख शिव के चरणों में
मांग लूंगी तुम्हारे
सुने पलों की रौनक !!

प्रकृति का जो स्नेह
बरसा है तुम पर
वो स्नेह वो करुणा
मुझे प्यारी है,
ये धरा ये गगन ये जीव इन
सभी में तुम्हें पाती हूँ,
क्या इन बिखरे इंद्रधनुषी
रंगों में मुझे समेट पाओगे !

क्या ले चलोगे एकबार
नदी के तट पर मुझे
मांग लूँगी उसकी कोमलता-
निर्मलता, तुम्हारे
उम्र भर के लिए ,
अच्छा लगता है रोज
मुझे चांद को निहारना
क्या थोड़ी देर मेरे
पास बैठ पाओगे!!

जीवन जीने का नाम है
मगर जो कभी
धड़कने टूटी मेरी,
क्या ढलते सूरज के
बसंती रंगों से
मुझे सजा पाओगे !!

ज्यादा कुछ नहीं मांगती
इस पल-पल बदलते दौर मे,
क्या आपने अंतर्मन में मुझे
थोड़ी सी जगह दे पाओगे!!

परिचय :- श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी
पति : श्री राकेश कुमार चतुर्वेदी
जन्म : २७ जुलाई १९६५ वाराणसी
शिक्षा : एम. ए., एम.फिल – समाजशास्त्र, पी.जी.डिप्लोमा (मानवाधिकार)
निवासी : लखनऊ (उत्तर प्रदेश)
सम्मान : राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर द्वारा “जीवदया अंतर्राष्ट्रीय सम्मान २०२४” से सम्मानित
विशेष : साहित्यिक पुस्तकें पढ़ने के शौक ने लेखन की प्रेरणा दी और विगत ६-७ वर्षों से अपनी रचनाधर्मिता में संलग्न हैं।
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।


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