
विजय गुप्ता “मुन्ना”
दुर्ग (छत्तीसगढ़)
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जो दशकों बनता रहा, सकल विश्व सिरमौर।
शौर्य शस्त्रागार का, ठहरेगा किस ठौर।।।
दुनिया के लघु देश फिर, जकड़न से आजाद।
कम ज्यादा सामान का, खुशी कभी अवसाद।।
विकास के सोपान की, जकड़ रखे कुछ देश।
एटम बॉम्ब निर्माण से, बदल लिया परिवेश।।
टैरिफ खौफ बढ़ा गया, छीना जग का चैन।
उधर मुनाफा ही बढ़ा, तकते सारे नैन।।
हमला भी ईरान पे, सतत चले जब बात।
अकड़ ठसन में ट्रंप था, उल्टी पड़ गई लात।।
काला सफेद झूठ सब, ट्रंप सोच के तर्क।
केंद्र ही व्यापार है, साफ झलकता फर्क।।
जब तक डॉन गिरी चली, खूब लिया आनंद।
सहनशक्ति अब अन्य की, गले पड़ा है फंद।।
जीवन डॉन उमर सदा, कुछ कड़ियों का तोड़।
आस पास के देश भी, कभी नहीं रणछोड़।।
धरा तुला कमजोर को, खूब दिखाई आंख।
अस्त्र शस्त्र गिरवा दिए, दाबे उनको कांख।।
भारत देश गिरफ्त में, आए कब महाराज।
मानो तो गुरु विश्व का, लगभग पहना ताज।।
ऑपरेशन सिंदूर में, कोशिश को बेताब।
श्रेय राह शिकस्त मिले, बहुधा खुले किताब।।
हड़प करो यदि तेल को, खुलते सभी सवाल।
तेल मुनाफा खोज में, लगी आग बाजार।
हे! अमरीका खुद कहो, तुम जीते या हार।।
नित बदले वो पैंतरा, होती दुनिया दंग।
जैसे कोई सिरफिरा, व्यर्थ करे हुड़दंग।।
आप विराजे शिखर पे, ग्लोबल को संदेश।
मुझको ही इनाम मिले, नोबल का उपदेश।।
हर कदम डायलॉग से, पलटे अपने बोल।
हीन नजर से देखने, द्वार रखे अब खोल।।
अमरीका तो दक्ष था, अब दिखती बकवास।
छोटे बड़े देश लगे, करने में उपहास।।
हे! मानव की गूढता, क्यों खोता ईमान।
गले पड़े की फांस में, फैल गया ईरान।।
ऐसी जंग सुनी नहीं, मिटता नहीं खुमार।
वाक्य युद्ध से चल रहा, निर्मम युद्ध बुखार।।
आपस में जो लड़ मरे, कितना और तबाह।
विश्व युद्ध हालात में, कुछ शांत मन निर्वाह।।
नमन उन देश को करें, अब तक जग बचाए।
धीरज से खुद रोकते, वो बड़ा कहलाए।।
परिचय :- विजय कुमार गुप्ता “मुन्ना”
जन्म : १२ मई १९५६
निवासी : दुर्ग छत्तीसगढ़
उद्योगपति : १९७८ से विजय इंडस्ट्रीज दुर्ग
साहित्य रुचि : १९९७ से काव्य लेखन, तत्कालीन प्रधान मंत्री अटल जी द्वारा प्रशंसा पत्र
काव्य संग्रह प्रकाशन : १ करवट लेता समय २०१६ में, २ वक़्त दरकता है २०१८
राष्ट्रीय प्रशिक्षक : (व्यक्तित्व विकास) अंतराष्ट्रीय जेसीस १९९६ से
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।
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