
विजय गुप्ता “मुन्ना”
दुर्ग (छत्तीसगढ़)
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नजर तो नजर है, खबर असर खूब,
सोचिए तो फर्श भी, स्पर्श से विलय धरे।
फेर होवे नजर का, तो नूर की नजर से,
नजर दशा दर्श को, स्पर्श मन से करे।
शब्द क्षुब्ध क्रुद्ध कभी, तो नेम धेम क्षेम के,
सार क्षार निहार से, बुद्ध का स्पर्श करे।
नाप का प्रताप भाव, माप दंड अति गूढ़,
भाव मिले पुष्प खिले, भाव ही स्पर्श भरे।
शब्द मर्म भाव धर्म, शब्द गुने बने लब्ध,
कमजोर ज्ञान गर, स्पर्श बिन वो गिरे।
निज मम्मा ममत्व में, पिता भाव घनत्व का,
शब्द अर्थ स्पर्श सत्य, श्री राम कृष्ण हरे।
शिव कृत्य नृत्य नाद, आदि ध्वनि डम डम,
शब्द संसार गूंज से, ऊर्जा शांति छाई है।
शब्द स्पर्श अर्थ व्यर्थ, खेल सदा डग मग,
मेरी बात तेरी बात, स्पर्श मात खाई है।
गाय निहित दक्षता, रख दूध में शुद्धता,
नकली वस्तु त्याग से, गाय स्पर्श जान लो।
धन कमाऊ स्पर्श तो, दुनिया का महारोग ,
स्पर्श वैसा छोड़कर, बदलाव ठान लो।
मासूम अदा झलक, महक ललक टेक,
हृदय स्पर्श करे वो, छटा ही निराली है।
कर्म झोली दुआ दवा, दम की अपील देख,
प्रभु स्पर्श की सदैव, दृढ़ रखवाली है।
संत ज्ञान ध्यान ढंग, सुनाते कथा सार जो,
आत्म सात स्पर्श रूप, अल्प भी मान गया।
पारस गुण याद है, स्पर्श करो लौह जब,
चमक से संसार को, स्वर्ण ही दिखा गया।
जलन अग्नि स्पर्श से, होते ख़ूब नुकसान,
खातिर बचाव ढंग, कुशल प्रयास है।
ठेस तंज प्रदाय तो, दुखती रग स्पर्श में,
महाभारत चोट भी, कटु इतिहास है।
नेक लक्ष्य स्पर्श दक्ष, रोक टोक स्पर्श पक्ष,
संज्ञान में प्रश्न यक्ष, उत्तर तो पाइए।
नियम अपराध है, मर्जी बिन स्पर्श तन,
जीवन जिक्र जेल का, भी शौक पा जाइए।
कविता सार कहते, शब्द ही स्पर्श करते,
देश की भी बागडोर, स्पर्श का खजाना है।
स्पर्श जैसा शब्द जब, परे स्वमेव स्पर्श से,
माहौल सदभाव तो, स्पर्श से सजाना है।
परिचय :- विजय कुमार गुप्ता “मुन्ना”
जन्म : १२ मई १९५६
निवासी : दुर्ग छत्तीसगढ़
उद्योगपति : १९७८ से विजय इंडस्ट्रीज दुर्ग
साहित्य रुचि : १९९७ से काव्य लेखन, तत्कालीन प्रधान मंत्री अटल जी द्वारा प्रशंसा पत्र
काव्य संग्रह प्रकाशन : १ करवट लेता समय २०१६ में, २ वक़्त दरकता है २०१८
राष्ट्रीय प्रशिक्षक : (व्यक्तित्व विकास) अंतराष्ट्रीय जेसीस १९९६ से
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।
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यह रचना “स्पर्श” के बहुआयामी अर्थों को अत्यंत प्रभावशाली और संवेदनशील ढंग से प्रस्तुत करती है। कवि ने जहाँ सकारात्मक स्पर्श की परिवर्तनकारी शक्ति को पारस के रूपक के माध्यम से उभारा है, वहीं अनुचित स्पर्श के दुष्परिणामों और उससे उत्पन्न पीड़ा को भी गहराई से दर्शाया है। कविता समाज को सजगता, मर्यादा और मानवीय संवेदनाओं के प्रति जागरूक करने का सशक्त संदेश देती है। ऐसी सार्थक, विचारोत्तेजक और समाजोपयोगी रचना के लिए हृदय से प्रशंसा।
— डॉ अजय आर्य
9300540698