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आधुनिकता

छत्र छाजेड़ “फक्कड़”
आनंद विहार (दिल्ली)
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तन सजा है
मन प्यासा है
भूखी रही सदा आत्मा
तन की लिप्सा
पूरी हो अभिप्सा
नारी की शोख अदा
बिक रही आह
बिक रही धड़कने
बिकती हैं शैया सलवटें
बिक रहे स्वप्न
बिकने को आतुर अस्मिता
बिक रही मन की चाहतें
जिधर उठे नजरें
बाजार सजा है
बिकने को परोसी गई
आह से वाह तलक
बिक जाती हैं मानवता
सुलग रही मंजिल की चाह
भूल गये मन अपनी राह….

कैसे लगे मोल
पसीने की बूँदों का
कैसे हो पहचान
इन्सानी रक्तबीजों का
सड़ रहा जो नाली में
कैसा है धर्म इसका
भाषा रह गई तौल-मोल की
पैसा स्थापित हुआ इन्सानी धर्म
सपने कैद राजमहलों में
हँस मजबूर गाना चुनने
व्यवसायीकरण होरहा लिप्सा का
कव्वे आरहे बिकने हँस के मोल..

इस खतरनाक परिवेश
आश्चर्य कहाँ और किसे
बाजार में उतरे नारी बिकने को
उपभोक्ता बन पुरुष बने भोक्ता
निष्ठुर बनाता भोग्या नारी को
कहाँ शालीनता, कैसी गरिमा
बंद रंग-बिरंगी मय बोतलों में
वासना की देवी बना पत्नियां
भेजी जाता ललना होटलों में…

इतिहास सजाता है
चाँदनी ताजमहल की
इतिहास दिखलाता
मोनालिसा की मूरत मोहिनी
हो निर्लज्ज भटक गई स्वयं नारी
करती अभिनय मंच पर
बन काम-केली की प्रतीक
पुरुष तो होता ही भेड़िया
कौन रोके
पड़ता है खूँखार टूट कर
बच रह गया दिखाने को
पुरुषार्थ पुरुष का
शिथिलता नारी की
बन गई नव-संस्कृति ये निर्लज्जता
अभिजात्य वर्ग की आधुनिकता
गौण हुये संस्कार
मौन हुआ संसार
घुटने टिक गये मानवता के
निर्दयी, क्रूर पुरुष
ले निर्लज्ज रूप दानवता का
स्वांग भरते नित मानवता का
कैसी विडम्बना
समाज स्वीकारता गर्व से
दुत्कारे जाते
कहलाते पिछड़े (बैकवर्ड)
जो नहीं स्वीकारते ये
तथाकथित आधुनिकता….!!

परिचय :- छत्र छाजेड़ “फक्कड़”
निवासी : आनंद विहार, दिल्ली
विशेष रूचि : व्यंग्य लेखन, हिन्दी व राजस्थानी में पद्य व गद्य दोनों विधा में लेखन, अब तक पंद्रह पुस्तकों का प्रकाशन, पांच अनुवाद हिंदी से राजस्थानी में प्रकाशित, राजस्थान साहित्य अकादमी (राजस्थान सरकार) द्वारा, पत्र पत्रिकाओं व समाचार पत्रों में नियमित प्रकाशन, राजस्थानी लोक गीतों के लिए प्रसिद्ध कंपनी “वीणा कैसेटस” के दो एलबमों में सात गीत संगीतबद्ध हुये हैं।
सम्मान : “राजस्थानी आगीवान” सम्मान से सम्मानित
श्री गंगानगर के सृजन साहित्य संस्थान का सृजन साहित्य सम्मान व
सरदारशहर गौरव (साहित्य) सम्मान व अनेक अन्य सम्मानरा
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।


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