
डॉ. आभा माथुर
उन्नाव (कानपुर)
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न जाने मुसीबतें स्वयं मुझे ढूंढ लेती हैं या मैं उन्हें बुला लेती हूं. यह घटना १९६५ या १९६६ की है । मैंने १९६५ में लखनऊ विश्वविद्यालय से एम्.एड किया था. आगे एम .एड. करने की इच्छा थी परंतु लखनऊ विश्वविद्यालय से एम.एड नहीं करना चाहती थी क्योंकि लखनऊ विश्वविद्यालय से एम्.एड. करने वालों को अधिकतर तृतीय श्रेणी में उत्तीर्ण होते देखा था। इसी ऊहापोह में एडमिशन का समय निकल गया। मैंने अगले वर्ष एम्.एड करने का मन बना लिया था, तभी एक परिचित लड़की मेरे पास आई। उसने बताया कि एक जूनियर हाई स्कूल उसी वर्ष हाई स्कूल कक्षाएं चालू करना चाहता था। परंतु उन्हें ऐसी शिक्षिका नहीं मिल रही थी जो ट्रेंड भी हो और उसके पास बी.ए. में अंग्रेजी विषय भी हो। बता दूं कि वह छोटा नगर अर्थात बदायूं था। उस जमाने में वहां केवल इंटरमीडिएट तक कॉलेज उपलब्ध थे। अतः अच्छी पढ़ी-लिखी और सेवा करने की इच्छुक लड़कियों की कमी होना स्वाभाविक था। उस स्कूल के संस्थापक एवं प्रबंधक ने कहलवाया था कि यदि मेरे पास बी.ए. में अंग्रेजी विषय था, तो वह मेरी नियुक्ति उस विद्यालय में करना चाहते थे। सरकार के नियमानुसार वेतन देने को वे तैयार थे. मेरे पास बी.ए. में अंग्रेजी साहित्य विषय तो था पर न तो मैं ट्रेंड ग्रेजुएट ग्रेड में नौकरी करना चाहती थी न उतने छोटे स्कूल में नौकरी करना चाहती थी। मेरा अरमान था कि एम्.एड करने के बाद किसी अच्छे और स्थापित विद्यालय में शिक्षण करूं। जो कम से कम इंटर कॉलेज हो। फिर भी यह सोचकर कि एम.एड. तो उस वर्ष हो नहीं सकता था, वेतन में भी कोई समझौता नहीं करना था, और सबसे बढ़कर घर बैठे प्रस्ताव आया था, मैंने वह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। वह स्कूल काफी खुली जगह में था। यद्यपि निर्मित भवन अधिक नहीं था परंतु आसपास काफी खुली जगह थी। नगर से लगभग तीन चार किलोमीटर दूर वह गांव जैसा लगता था। मैं साइकिल से स्कूल आती जाती थी। साइकिल मेरे पास तभी से थी जब मैं लखनऊ विश्वविद्यालय में पढ़ती थी। लखनऊ तो खैर लखनऊ था, पर बदायूं में साइकिल चलाने वाली मैं पहली लड़की थी। एक बार मैंने स्कूल में देखा कि १० -११ वर्ष का एक बच्चा दौड़ रहा था और बहुत सी मधुमक्खियां उसके पीछे उड़ रही थी बच्चे को मधुमक्खियों से बचाने के विचार से मैंने उसका हाथ पकड़ कर मधुमक्खियों से दूर खींच लाने की सोची। फिर उसके बाद जो हुआ उसे बताना मुश्किल है। मधुमक्खियां अब मेरे पीछे पड़ गईं थीं। कितनी दूर तक मैं उसे बच्चे का हाथ पकड़े रही और कब वह गिर पड़ा मुझे नहीं मालूम। सैकड़ों मधुमक्खियां एक साथ मुझे काट रही थीं। मैं पता नहीं क्या-क्या चिल्लाती जा रही थी और दौड़ती जा रही थी। शायद मैं “बहन जी मुझे बचा लीजिए” चिल्लाती हुई विद्यालय की प्रिंसिपल के पीछे-पीछे दौड़ रही थी, जो स्वयं अपनी आठ माह की बच्ची को लिए हुए दौड़ रही थीं। पूरे परिसर में दौड़ भाग और चीख पुकार मची थी। उस समय मुझे अनुभव हुआ कि जब जिंदा स्त्री को जबरन चिता में जलाते होंगे तब उसे कैसा अनुभव होता होगा। मधुमक्खियों का छत्ता छिड़ गया था और उनका मुख्य लक्ष्य मैं ही थी। जिस बच्चे को बचाने के चक्कर में मैं मुसीबत में फंस गई थी वह रास्ते में ठोकर खाकर गिर गया था और उसे किसी ने उठाकर कमरे में अंदर से बंद कर लिया था। छत्ता छिड़ जाने पर यही एकमात्र इलाज है। वहां के लोग गांव से संबंधित थे और ऐसे समय पर क्या करना चाहिए यह जानते थे। मेरे शरीर में आग की लपटें सी उठ रही थीं पर दिमाग लगातार सोच रहा था। हाई स्कूल में गृह विज्ञान के अंतर्गत दुर्घटनाएं घट जाने पर क्या करना चाहिए इसकी जानकारी भी पढ़ाई जाती थी। विभिन्न प्रकार के विष खाने पर, आग से जलने पर, किसी के डूब जाने पर, साँप बिच्छू के काटने पर, आँख कान या नाक में कुछ फंस जाने पर क्या करना चाहिए यह सब मुझे याद था पर मधुमक्खियों का छत्ता पीछे पड़ जाने पर क्या करना चाहिए यह न पढ़ा था न सुना था। मधुमक्खियों से कटते हुए और चिल्लाते हुए मैं लगभग दो फ़र्लांग दौड़ चुकी थी, तभी रास्ते में एक प्राइमरी स्कूल आ गया। उस स्कूल की जो शिक्षिका थी वह इंटरमीडिएट में मेरी सहपाठिनी रह चुकी थी, यद्यपि आयु में मुझे बहुत बड़ी थी। मैंने चिल्लाते हुए उसे आवाज दी तो उसने तुरंत दरवाजा खोलकर मुझे अंदर बुला लिया। मैंने साड़ी खोलकर बाहर ही डाल दी जिसमें सैकड़ो मक्खियाँ भरी थीं। मैंंने भूतपूर्व सहपाठिनी यानी कृष्णा को पूरी बात बताई। बात समाप्त होने के बाद कृष्णा ने मेरे बालों में अपनी उंगलियां चलाईं तो ढेरों मक्खियाँ निकल कर उड़ीं यानि उस समय भी इतनी मक्खियाँ मेरे बालों में भरी थी। कुछ देर आराम करने के बाद कृष्णा ने दरवाजा खोलकर मेरी साड़ी झटकी तो उस समय भी उस नायलॉन की साड़ी में से असंख्य मक्खियाँ निकल कर उड़ीं। साड़ी पहनकर मैं वापस स्कूल लौटी और अपनी साइकिल उठाकर रास्ते में डॉक्टर को दिखाती हुई घर आ गई। बाद में मालूम हुआ। कि वह मधुमक्खियां नहीं थी बल्कि डिंगारा नाम के कीड़े का छत्ता था जो बर्र यानि ततैया से मिलता जुलता होता है। उस बच्चे ने शैतानी में डिंगारे के छत्ते में पत्थर मार दिया था। जिसके कारण पूरा छत्ता पहले तो उस बच्चे के, और बाद में मेरे पीछे पड़ गया था। यह भी सुनने में आया था कि डिंगारा इतना अधिक बदला लेने वाला होता है कि शत्रु यदि पानी में यानी नदी या तालाब में कूद जाए, तो भी पानी के ऊपर मँडराता रहता है और शत्रु के बाहर निकलते ही काटता है।
घर में जाकर मैंने शरीर में चुभे हुए डंक निकलवाए। कीड़ा जब काटता है तो उसका डंक टूट जाता है और शरीर में चुभा रह जाता है जो दिखाई भी देता है। उसे सावधानी से पकड़कर खींचकर निकाल देना चाहिए। कुछ डंक तो निकल गए और कुछ सुई से निकालने पर भी नहीं निकले। कुछ मिले ही नहीं। रात को बड़ी जोर का बुखार आया। अगले दिन स्कूल में सब टीचर्स के चेहरे सूजे हुए थे पर सबसे बुरी दशा मेरी थी। रजिस्टर डे होने के कारण दुर्घटना वाले दिन सब बच्चे तो अपने घर जा चुके थे, छत्ते में पत्थर मारने वाला बच्चा न जाने क्यों घर नहीं गया था। उसके बाद जब चेहरे की सूजन समाप्त हो गई तब भी कान तीन-चार दिनों तक सूजे रहे। डिंगारे भी तीन-चार दिन तक क्रोध में रहे और उड़ते दिखाई दिए। पर उन्हें देखते ही सब लोग कमरे में घुसकर अंदर से कमरा बंद कर लेते थे। मेरे मन में तो इतना डर बैठ गया था कि घरेलू मक्खियों से भी तीन-चार दिन तक डर लगता रहा। यह घटना जीवन की ऐसी घटना बन गई जो मुझे कभी नहीं भूलेगी।
परिचय :- उन्नाव (कानपुर) निवासी आभा माथुर ज़िला शिक्षा और प्रशिक्षण संस्थान के प्राचार्य (डिप्टी डायरेक्टर के समकक्ष) पद से सेवा निवृत्त हैं आपने प्रधानाचार्या, डी.आई.ओ.एस., डायट प्राचार्य आदि पदों पर रहकर उत्तर प्रदेश के विभिन्न ज़िलों में सेवा की।
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।
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