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कब तक बली की वेदी पर चढती रहेंगी बेटियाँ

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी
लखनऊ (उत्तर प्रदेश)
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सजती है नुमाइश
समाज मे बेटियों की
और लगती है
बोलियां बेटों की,

अखिर कब तक
बेटियों को सिसकते
मौत को गले लगाता
देखते रहेंगे उनके परिजन?

माता-पिता बन दुलार दिया
बेटे-बेटी को बराबर का,
फिर क्यूँ घर आई
बेटी की बलि चढाते है
दहेज और नफरत की बेदी पर?

धधक रही हैं घरों और
रसोई में ना जाने कितनी बेटियाँ,
कब तक जकडी रहेंगी
अत्याचार और खौफ की ये बेड़ियाँ?

क्यूँ तौलते हैं उस दौलत के
तराजू पर बेटियों को,
जहां चंद सिक्कों के लिए
बेच देते हैं लोग सम्मान को।

लाजो से पली राजकुमारी
एक दिन भेंट चढ़ जाती हैं
दहेज के दानव पर
और राख हो जाती हैं
अग्नि में एक तिनके की तरह।

बेटी कोई वस्तु नहीं
उनका कोई मोल नहीं
इतिहास भरे हैं इनकी
करुणा और वीरता की
सच्ची कथाओं से।

अब तो उठो समाज के
पहरेदारों कानून के रखवालों,
दो ऐसा दंड इस पाशविक
प्रवृत्ति वाले इंसानो को,
कि जन्म ना ले सके
ऐसे इंसान समाज मे
बेटियों के भक्षक बन कर।।

बेटियों तुम जलती हुई मशाल बनो
ना हारो, ना दफन हो,
ऐसे रसूखदारो ऐसे दानवों से,
शक्ति का स्वरूप हो, भस्म करो
समाज के ऐसे राक्षसों को।
ईश्वर का अनमोल उपहार
हो इस धरती पर,
लहराओ अपना परचम
अपनी आन-बान शान से
इस जहान में

परिचय :- श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी
पति : श्री राकेश कुमार चतुर्वेदी
जन्म : २७ जुलाई १९६५ वाराणसी
शिक्षा : एम. ए., एम.फिल – समाजशास्त्र, पी.जी.डिप्लोमा (मानवाधिकार)
निवासी : लखनऊ (उत्तर प्रदेश)
सम्मान : राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर द्वारा “जीवदया अंतर्राष्ट्रीय सम्मान २०२४” से सम्मानित
विशेष : साहित्यिक पुस्तकें पढ़ने के शौक ने लेखन की प्रेरणा दी और विगत ६-७ वर्षों से अपनी रचनाधर्मिता में संलग्न हैं।
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।


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