
अशोक कुमार यादव
मुंगेली (छत्तीसगढ़)
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(छत्तीसगढ़ी बोली)
बरखा रानी आगे, धान ह बोंवागे।
हरियर रंग छागे, किसान के भाग जागे।।
भुईयाँ महतारी के होगे सिंगार।
चलव मनाबो हरेली तिहार।।
अमावस के दिन ह, हे बड़ पावन।
बरस के पहिली परब, हे मनभावन।।
नांगर, कुदरी के पूजा करहीं संसार।
चलव मनाबो हरेली तिहार।।
लईका मन बाँस के गेड़ी खपाहीं।
रचमच-रचमच चघे, गली-खोर म आहीं।।
जम्मों कोती बगरही खुशी के उजियार।
चलव मनाबो हरेली तिहार।।
गुरतुर गुड़हा चीला ह बिकट मिठाही।
माईलोगिन मन उकेरहीं चित्र सवनाही।।
कुटकी देबी ह करही जन के उद्धार।
चलव मनाबो हरेली तिहार।।
बरदिहा, पहटिया मन डारी खोंचे आहीं।
लोहार मन चौंखट म खीला गड़ियाहीं।।
गोरइंया देवता ह सुनही सबके पुकार।
चलव मनाबो हरेली तिहार।।
निवासी : मुंगेली, (छत्तीसगढ़)
संप्राप्ति : शिक्षक एल. बी., संस्थापक एवं अध्यक्ष यादव समाज सेवा, कला, संस्कृति एवं साहित्य उन्नयन समिति मुंगेली।
प्रकाशित पुस्तक : युगानुयुग
सम्मान : मुख्यमंत्री शिक्षा गौरव अलंकरण ‘शिक्षादूत’ पुरस्कार से सम्मानित, उत्कृष्ट शिक्षक सम्मान, छत्तीसगढ़ हिन्दी रत्न सम्मान, अटल स्मृति सम्मान, बेस्ट टीचर अवॉर्ड।
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