
डॉ. मुकेश ‘असीमित’
गंगापुर सिटी, (राजस्थान)
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हे पथिक, ज़रा ठहर।
हाँ, तू शहर से आया है, मुझे पता है क्यों आया है। “आहा ग्राम्य जीवन” की पीएचडी करने निकला होगा। आ, मेरी छाँव में बैठ जा। जुगाड़ की सवारी ने तेरी रीढ़ की हड्डी को लोकतंत्र की तरह ढीला कर दिया होगा। मैं इस गाँव का बरगद हूँ,पुराना, अनुभवी और वक्त के थपेड़ों से घायल होकर बेकार घोषित हो चुका हूँ। पहले मेरे नीचे प्रेम कहानियाँ पनपती थीं, अब योजनायें और घोषणाओं के पोस्टर चिपकते हैं। प्रेम के नाम मिट गए, विकास के वादे चिपक गए, दोनों का हश्र लगभग एक जैसा ही है।
तू पूछेगा, गाँव कितना बदला? तो सुन, गाँव बदला नहीं, बदलने की घोषणाएँ बार-बार हुई हैं। यहाँ “विकास” कम, “बदला” ज़्यादा चलता है। लोग बच्चे इसलिए पैदा करते हैं कि कोई तो पुरखों की दुश्मनी का ईएमआई चुकाए। परिवार, मोहल्ला, पूरा गाँव, सब बदले का उधार के हिसाब चुकता करने में जी रहे हैं। उधर देख, कुत्ता मेरी जड़ पर टाँग उठाए खड़ा है और गधा उसे निर्लिप्त भाव से निहार रहा है। यही है हमारा विकास मॉडल। कुत्ते की पूँछ में योजनाएँ बंधी हैं, जो रसूखदारों के सामने तुरंत टाँगों के बीच सिमट जाती हैं।
और गधा? वह राशन, राहत और रिश्वत को त्रिदेव मानकर संतोष में जी रहा है। यह सड़क देख,सड़कछाप सड़क। बरसात में कीचड़ से सनी, गर्मी में धूल धूसरित और चुनाव में दुल्हन सरीखी सजी। पाँच साल बाद सिंगार होता है, फिर वही धूल-धूसरित वैधव्य। किनारे पड़े उखड़े पत्थर कभी वादे
थे, अब उनके स्मृति चिन्ह बन चुके हैं। मेरी छाँव में पंचायत बैठती है। आज भी बैठी थी। प्रधान जी अपने उदर सहित विराजमान थे, विकास का सबसे भरोसेमंद गोदाम। मनरेगा से लेकर पेंशन तक सब वहीं संग्रहित है। वे बाद में आते हैं, उनका पेट पहले पहुँच जाता है, ऐसे विकास की स्पीड देखकर वैज्ञानिक भी चकरा जाएँ। यहाँ हर आदमी की जेब में विकास की पुड़िया रहती है। जब जी चाहा, उसे मसलकर मुँह में डाल लिया और दीवारों पर छींटे उड़ा दिए। विकास यहाँ चींटी से भी हल्का है, हथेली पर कुचलें तो विकास की अगुआई में बजायी गयी ताली समझ ली जाती है।
स्कूल उधर है, वहां प्रधान जी की भैंसों का तबेला। पढ़ाई मेरी छाँव में होती है। पहली से पाँचवीं तक के बच्चे एक ही कक्षा में समाये हुए हैं, समता का ऐसा मॉडल कि शिक्षक और छात्र में भी अंतर मिट गया है। कभी मास्टर बच्चों को पीटता है, कभी बच्चे मास्टर को। लोकतंत्र में साम्यवाद की जड़ें यहीं मजबूत होती हैं। आज मास्टर जी “शून्य” पढ़ा रहे थे, “शून्य हमारी महान खोज है, और गाँव की स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क और रोजगार व्यवस्था में इसका व्यापक प्रयोग हमारी परंपरा है।” मिड-डे मील में बच्चे, कुत्ते और छिपकलियाँ सब समान अधिकार से पोषण पाते हैं। छिपकलियाँ तो इतनी संतुष्ट कि दाल में ही बिस्तर लगाकर सो जाती हैं, सरकारी योजनाओं की असली लाभार्थी वही हैं।
यहाँ से बच्चे शहर जाते हैं, डिग्री लेकर लौटते हैं, ताकि बेरोजगारी को गरिमा मिल सके। बिना पढ़े होते तो खेत में लग जाते, अब पढ़-लिखकर “सम्मानित निष्क्रियता” का आनंद लेते हैं। शाम होते ही गाँव मनोरंजन चैनल बन जाता है, गालियों का लाइव प्रसारण, फब्तियों का रियलिटी शो। फिर जुए की बिसात बिछती है, कुछ ताश में भविष्य ढूँढते हैं, कुछ देसी ठर्रे में। धर्म और राजनीति का संयुक्त उपक्रम भी यहीं चलता है। पुजारी और नेता साथ बैठकर चौसर खेलते हैं, एक परलोक का रास्ता बताता है दूसरा इहलोक का । गाँव गड्ढे में गिरकर भी कहता है, “ईश्वर की इच्छा।”
पोलिंग बूथ भी यहीं है,जूते-चप्पल का अभ्यास यहीं से शुरू होता है, संसद में जाकर परिष्कृत होता है। अगर तुझे “आहा ग्राम्य जीवन” का प्रमाण चाहिए, तो उस शिलालेख का फोटो ले ले, “आदर्श ग्राम,समृद्धि का मॉडल।” जल्दी कर, इस से पहले की कुत्ते की उठी टांग उसे अभिसिंचित कर दे ।
तू चुप है, नोटबुक बंद है, अच्छा ही है। छोड़ दे इन्हें इनके हाल पर, ये विकास पुरुष हैं, ग्राम-विकास की आंच पर अपनी-अपनी रोटियाँ सेंक रहे हैं। फिर भी उम्मीद बची है, अगर विकास कागज़ से उतरकर सड़क तक पहुँचे, जाति दिमाग से निकले, धर्म बाँटे नहीं और योजनाएँ पेट से निकलकर जमीन पर आएँ।
वरना, पथिक…
यहाँ “आहा” कम, “आह” ज़्यादा है।
हे पथिक ज़रा ठहर …
निवासी : गंगापुर सिटी, (राजस्थान)
व्यवसाय : अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ
लेखन रुचि : कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं
प्रकाशन : शीघ्र ही प्रकाशित पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से), काव्य कुम्भ (साझा संकलन) नीलम पब्लिकेशन, काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन) लायंस पब्लिकेशन।
प्रकाशनाधीन : व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन) किताबगंज प्रकाशन, गिरने में क्या हर्ज है -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह) भावना प्रकाशन। देश विदेश के जाने माने दैनिकी, साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित।
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