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सत्ता के सौदागर

छत्र छाजेड़ “फक्कड़”
आनंद विहार (दिल्ली)
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सत्ता के सौदागर सदैव
लाशों के ढेर लगाते हैं
ईमान धर्म पिछले दरवाजे
से कब के बाहर जाते हैं

तिनके की आहट से भी
सहम-सहम ये जाते हैं
हिलती दिखे कुर्सी इनकी
तो झट षड्यंत्र रचाते हैं
साम,दाम,दंड भेद से
खिचड़ी ऐसी पकाते हैं
देख पैंतरे इनके विरोधी
इनसे मात खाते हैं
उजले वस्त्रों से चमक दमक
करतब काले कर जाते हैं
सत्ता के सौदागर सदैव
लाशों के ढेर लगाते हैं

सत्ता वो तोता है जिसमें
इनके प्राण है अटके
तोते की रक्षा में होते हैं
इनके सारे लटके-झटके
महत्वाकांक्षा में जो बाधा
बने वे सदैव ही है खटके
जब लगा दाव बिना चुके
चेलों ने है गुरुओं को पटके
जिसने पढा पाठ पटकन
का वे ही सत्ता पाते हैं
सत्ता के सौदागर सदैव
लाशों के ढेर लगाते हैं

अपना उल्लू सीधा कर ये
वादे रोज भुलाते हैं
एक बार जो जीत गया
अगले चुनाव ही नजर आते है
जनता भोली-भाली है
कर लेती इनक विश्वास
झूठे वादे गले लगा कर
नित उठ लगाते नई आस
कब समझेंगे मतदाता सत्य
झूठमूठ ही इन्हें रिझाते है
सत्ता के सौदागर सदैव
लाशों का ढेर लगाते हैं

किसका रिश्ता, कैसा रिश्ता
प्राणों का हरना है एक खेल
इक सिक्के के है दो पहलू
कब होता सत्य नेता का मेल
अमृत सींचने से ही क्या
मीठी हो जाती है विष बेल
राजनीति के इस अखाड़े में
बस झूठों की है रेलम् पेल
“यूज एंड थ्रो”” का कलचर
नेता सदा अपनाते हैं
सत्ता के सौदागर सदैव
लाशों का ढेर लगाते हैं

परिचय :- छत्र छाजेड़ “फक्कड़”
निवासी : आनंद विहार, दिल्ली
विशेष रूचि : व्यंग्य लेखन, हिन्दी व राजस्थानी में पद्य व गद्य दोनों विधा में लेखन, अब तक पंद्रह पुस्तकों का प्रकाशन, पांच अनुवाद हिंदी से राजस्थानी में प्रकाशित, राजस्थान साहित्य अकादमी (राजस्थान सरकार) द्वारा, पत्र पत्रिकाओं व समाचार पत्रों में नियमित प्रकाशन, राजस्थानी लोक गीतों के लिए प्रसिद्ध कंपनी “वीणा कैसेटस” के दो एलबमों में सात गीत संगीतबद्ध हुये हैं।
सम्मान : “राजस्थानी आगीवान” सम्मान से सम्मानित
श्री गंगानगर के सृजन साहित्य संस्थान का सृजन साहित्य सम्मान व
सरदारशहर गौरव (साहित्य) सम्मान व अनेक अन्य सम्मानरा
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।


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