
अशोक कुमार यादव
मुंगेली (छत्तीसगढ़)
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(छत्तीसगढ़ी बोली)
मरे पुरखा मन के बिकट आव-भगत होवत हे,
जियत-जागत मनखे के कोनो नइ हे पुछारी।
सरग के पहुना मन बर बरा अउ चीला बनत हे,
घर के दाई-ददा मन बर नइ हे भात अउ पानी।।
गोबर म लिपागे कुरिया के ओरिया अउ परछी,
चाँउर पिसान के चउँक पुरागे सुग्घर सजे सिंगार।
रंग-रंग के फूल-फलेता, पाना दसे हे ओरी-ओर,
हूमहई म हूम ममहागे, कउँवा ह बने हे परुवार।।
मुरदा मन के मान-गुन होथे, चढ़थे फूल के हार,
कलप-कलप के जम्मो रोथें, सुरता के बाँधे गठरी।
पितर मन के बंदगी करे ले तोला मिलही पितर,
तँय भगवान ल सुमर, लमाके भक्ति के सुतरी।।
जीते-जियत म सेवा कर, झन कर मरे के अगोरा,
ओही मन भुइयाँ के देवता, मत भेज बुढ़वा घर।
सियान मन के आरती उतार, चरन धो-धो के पी ले,
घर ह बैकुंठ बनही, उँखर जीव जुड़ाही हर बछर।।
निवासी : मुंगेली, (छत्तीसगढ़)
संप्राप्ति : शिक्षक एल. बी., संस्थापक एवं अध्यक्ष यादव समाज सेवा, कला, संस्कृति एवं साहित्य उन्नयन समिति मुंगेली।
प्रकाशित पुस्तक : युगानुयुग
सम्मान : मुख्यमंत्री शिक्षा गौरव अलंकरण ‘शिक्षादूत’ पुरस्कार से सम्मानित, उत्कृष्ट शिक्षक सम्मान, छत्तीसगढ़ हिन्दी रत्न सम्मान, अटल स्मृति सम्मान, बेस्ट टीचर अवॉर्ड।
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