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मगर पता कब चला
कविता

मगर पता कब चला

छत्र छाजेड़ “फक्कड़” आनंद विहार (दिल्ली) ******************** समय को सब कुछ सहते देखा मजबूर सत्य को बहकते देखा मगर पता कब चला घर की दीवारों को... गिरने लगे तो फिर गिरते ही गये रास्ते पतन के अविरल बढते गये मगर पता कब चला विश्वास के आधारों को... कदम बढा भी दिये गये अब आगे स्वार्थ के लिए सिद्धांत ऊंचे टांगे मगर कब किसने देखा लौट कर आते सवारों को... हंस हंस कर जीवन जी ही लिया खुशियों को गम छूने ही ना दिया मगर कब किसने देखा नभ में रोते हुये तारों को... चांद के उजालों में रात रोते देखा पाप और धर्म को संग सोते देखा मगर कब किसने देखा खाली होती मजारों को... भाई ने भाई से मुंह फेर लिया संबंधों को सियासत घेर लिया मगर कब किसने देखा जात-धर्म के चटखारों को... नेताओं से डर को सहमते देखा कुर्सी हेतु धर्म को मिटते देखा मगर कब पता चला लुटने का अपने ह...
शौर्य यात्रा
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शौर्य यात्रा

किरण विजय पोरवाल सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** शोर्य वीरता स्वाभिमान है वीर पराक्रमी योद्धा यहां, चाहे रक्त बहा धर्मवीरों का पर धर्म सनातन अमर यहाँ, वार किया विध्वंस किया मूल नाश किया उन आतताईयो ने, मुगलों ने मंदिरो को तोड़े है पर "आस्था" तोड़ न सके मन का। मुगलों का आक्रमण झेला है, कितने मंदिरों को तोड़ा है, आखिर में हार गए पापी, पर धर्म को सनातनियों ने नहीं छोड़ा है। थे एकजुट हे एक लक्ष्य हे मानवता हे प्रेम यहां, हे वीर पराक्रमी योद्धा यहां, हे देशभक्त हे संत यहां, हे धर्म संस्कृति का पाठ यहां हे तप तपस्या का भाव यहां, हे ज्ञान का दीप, सहानुभूति यहां, हे भाईचारे जैसे संबंध यहां। चाहे साल शताब्दी संवत बीते, नहीं मिटा सके कोई धर्म यहां, रग रग कण-कण में व्याप्त यहां हे परमेश्वर का हे वास यहां। इसे मिटा नहीं सकता कोई मिट गए यहां मिटान...
आया बसन्त
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आया बसन्त

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** बसन्ती बयार बह रही घर, आगंन, चौखट, द़ारे रविकिरण लजा रही छुप-छुप कर गगन मे। बेले झुम रही अधखिली कलियो का बोझ लिए । भौरो का गुन्जन होता पुष्प पराग से पेडो के पर्ण हिल-हिल कर लेते बलय्या मां सरस्वती को देते बसन्त की बधाई या। कही कोयल कूकती स्वागत मे कही झरनो की फुहारे भरे स्फुरण कही झरना नहलाता बसन्त को तो कही पलाश फूल लाल टीका लगता। भरमाये भागते बादल बसन्त से धूप-छाँव का खेल खेलते नदी, तडाग की लहरे देती बसन्त को झुले सागर की मीन नृत्य करती बसन्त की अगवानी मे। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचना ...
चंद अल्फाज़
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चंद अल्फाज़

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** आप में सुशीलता है या नखरो नाज, आपके मुंह से निकला चंद अल्फाज, बयां कर जाता है आपका किरदार व अंदाज, आपके रहन सहन का तरीका, आपके जीवन जीने का सलीका, ए आइ के जमाने में आज हम पहुंचे हैं भले, मगर भांपने का तरीका रहा है पहले, आपकी सोच, आपके मित्र, आपके जीवन जीने का अंदाज और ये इत्र, बहुत कुछ बता देता है, आप इस धोखे में मत रहिए कि चरित्र को छुपा लेता है, ये अल्फाज ही है जो दिलाता है मान सम्मान, तो कभी दिलाता है रुसवाई और अपमान, कब,कहां,कौन से शब्द कहने है लो जान, समाज में रहकर ही सीखा जाता है ज्ञान, दिख जाता है बहुत जगह पढ़ा लिखा गंवार, जो नहीं जानता तहज़ीब और प्यार, तो अल्फाजों को संभाल कर रखिए, किसके सामने क्या बोलना है आंखें खोलिए और देखिए। परिचय :-  राजेन्द्र लाहिर...
सब शौक हुए पूरे, अब सांसों को जीना …
कविता

सब शौक हुए पूरे, अब सांसों को जीना …

प्रेम नारायण मेहरोत्रा जानकीपुरम (लखनऊ) ******************** सब शौक हुए पूरे, अब सांसों को जीना। वो देता ज्ञान अमृत, बस उसको ही पीना है। सब शौक... दी हमको श्रेष्ठ योनी, उपकार है प्रभू का। परिवार दिया उत्तम, ये प्यार है प्रभू का। दायित्व जो भी देता, पूरे वही कराता। जैसे भी प्रभु रखे, वैसे हमें जीना है। सब शौक... सृष्टि का सृजन करता, ये कार्य है प्रभू का। सृष्टि को पोषणा भी, इक कार्य है प्रभू का। गिनती की मिली सांसे, निश्चित है ये रुकेंगी। जो भी बची है उनको, सुमिरन में लगाना है। सब शौक... मानव की योनी ईश्वर, मुक्ति के हेतु देता। बुद्धि विवेक देकर, वो श्रेष्ठ बना देता। सब संत यही कहते, बस राम नाम जप तू। प्रभू नाम में ही रमकर, मुक्ति को भी पाना है। सब शौक ... परिचय :- प्रेम नारायण मेहरोत्रा निवास : जानकीपुरम (लखनऊ) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करत...
क्या करें कि …
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क्या करें कि …

सुशी सक्सेना इंदौर (मध्यप्रदेश) ******************** सुना है हर दर्द मिट जाते हैं, मुस्कुराने से। क्या करें कि... आंसू आ ही जाते हैं, किसी न किसी बहाने से। आँधियों का तो काम ही है चिरागों को बुझाना क्या करें कि... हम भी पीछे नहीं हटते चिरागों को जलाने से। जो अपने हुआ करते हैं वो रूठा नहीं करते क्या करें कि... हर कोई अपना नहीं बनता लाख मनाने से आंखों ने देख लिए हैं न जाने कितने समुंदर क्या करें कि... अब प्यास नहीं बुझती किसी भी मयखाने से रात भर जागा किए हम जिसके दीदार के लिए क्या करें कि... ऐ साहिब, उस चांद को बादलों ने छुपाकर रखा है जमाने से परिचय :- सुशी सक्सेना निवासी : इंदौर (मध्यप्रदेश) इंदौर (मध्यप्रदेश) निवासी सुशी सक्सेना वर्तमान में, वेबसाइट द इंडियन आयरस और पोगोसो ऐप के लिए कंटेंट राइटर और ब्लॉग राइटर के रूप में काम करती हैं। आपकी कवि...
वो मेरे पिता हैं
कविता

वो मेरे पिता हैं

बाल कृष्ण मिश्रा रोहिणी (दिल्ली) ******************** वो तप है, धर्म है, विवेक है, कर्म है वो विद्या है, बुद्धि है, बल है, श्रम है।। वो श्री है, शक्ति है, श्रेष्ठ है, संबल है, वो जनक है, पालक है, पोषक है वो जल, धरा, गगन, वायु, अग्नि, सूर्य, चंद्र है, वो मेरे स्वर्ग हैं।। वो कर्तव्य है, प्रतिष्ठा है, उपासना है, वो धन है, धर्म है, सुख है, प्रार्थना है वो वेद है, उपनिषद है, भक्ति है वो कृष्ण के श्लोक, राम की चौपाई है वो मेरे पिता हैं।। परिचय :- बाल कृष्ण मिश्रा निवासी : रोहिणी, (दिल्ली) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। प्रिय मित्र, शुभचिंतक एवं परिवारजन आपको प्रेषित मेरी नई स्वरचित रचना, कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...🙏🏻😊💐💐💐 राष्ट्रीय ...
सात अधोलोक
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सात अधोलोक

सुषमा शुक्ला इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** हिंदू पुराणोंके अनुसार कुल मिलाकर सात अधोलोक हैं अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, रसातल और पाताल। अतल की गहराइयों में इच्छाओं का वास है, जहाँ माया मुस्काती है, भोगों का प्रकाश है। वहाँ सत्य भी छल बन जाए, ऐसा उसका जाल, मनुष्य अपने ही मन में खो दे विवेक का हाल। वितल में वैभव रहता, स्वर्ण समान चमकता, लोभ की चकाचौंध में हर विवेक है भटकता। धन ही देव बन बैठा, कर्म हुआ है मौन, जहाँ सुख क्षणिक लगते हैं, शांति रहती कौन? सुतल वह तल है जहाँ बलि का शासन गाया, अहंकार को त्याग जहाँ विष्णु ने सिखलाया। दमन नहीं, मर्यादा है वहाँ का विधान, त्याग से ऊँचा होता है सच्चा इंसान। तलातल और महातल, भय और विष के धाम, असुरों की आकांक्षाएँ, अंधकार का नाम। क्रोध, ईर्ष्या, द्वेष यहाँ साँसों में पलते, मानव मन के राक्षस भी यहीं आकर ढलते। ...
गीता ज्ञान-जीवन निदान
कविता

गीता ज्ञान-जीवन निदान

मोहिनी गुप्ता राजगढ़, ब्यावरा (मध्य प्रदेश) ******************** कुरुक्षेत्र - समर में दिया श्री कृष्ण ने अर्जुन को ज्ञान। अज्ञान से ज्ञान की ओर "गीता ज्ञान - जीवन निदान"। गीता के हर श्लोक में होती कुछ ज्ञान की बात। समझ जाए जो नर नारी तो होता जीवन पार। देते इक श्लोक में श्री कृष्ण अर्जुन को ये सीख। नहीं इन्द्रियों के वश में रह कर कुछ कर्म उचित। हो न्यायोचित कर्म और हो जगत का कल्याण। रख दूर स्वयं को भोग इंद्रियों से कहना ये मान। इंद्रियों से श्रेष्ठ मन और मन से भी श्रेष्ठ मानस। मानस (बुद्धि) से भी श्रेष्ठ आत्मा जगत का सार। आत्मा जो अजर - अमर है इंद्रियां तो स्थूल है। न कभी मरती है और न ही कभी लेती जन्म है। पा इंद्रियों पर विजय लगाए ईश आराधना में ध्यान। उसका कर्म और जीवन हो जाता है सफल बारंबार। हे पार्थ ! उठो ! अपने मन से निकालो भय। कर विवेक का प्र...
पूस मास की शीत
कविता

पूस मास की शीत

मीना भट्ट "सिद्धार्थ" जबलपुर (मध्य प्रदेश) ******************** थरथर धरती काँपतीं, काँपे हैं हर लाल। ठिठुर रहे सब ठंड से, द्वारे आया काल।। मौसम सर्दी आ गया, हुआ ठंड का जोर। काँप रहे हैं हाथ भी, त्रास दे रही भोर।। ठंड ये पूस मास की, लेती सबकी जान। मार्गशीर्ष थी शीत कम, अब सो कंबल तान।। भगती कहाँ अलाव से, पूस मास की शीत। नाम धूप का है नहीं, कुहरा छाया मीत।। दुबक रजाई में रहे, बच्चे वृद्ध जवान। ठंड कड़ाके की पड़ी, खोले कौन दुकान।। मफलर बाँधा कान में, दस्ताने हैं हाथ। मौजे पहने पाँव में, चलें ठिठुर कर पाथ।। घर आजा मनमीत अब, आया मौसम शीत। नित्य विरहा में डूबती, रहती प्रिय भयभीत।। पूस मास दे त्राण है, नित्य चलाता वाण। सर्दी बड़ी प्रचंड है, कर प्रभु अब कल्याण।। यौवन पर तो शीत है, वयोवृद्ध हैं मौन। सिर पर सबके नाचती, पीर हरे अब कौन।। स्वेटर भी शरमा र...
नौकरिहा दामाद
आंचलिक बोली, कहानी

नौकरिहा दामाद

प्रीतम कुमार साहू 'गुरुजी' लिमतरा, धमतरी (छत्तीसगढ़) ******************** (छत्तीसगढ़ी कहिनी) गाँव के गउटियाँ कहत लागें दुकलहा करा कोनो जिनिस के कमी नइ रिहिस। खेत, खार, धन दउलत, रुपिया, पइसा सबों जिनिस रिहिस। सादा जीवन उच बिचार के रद्दा म चलत दुकलहा अउ दुकलहिन मजा म जिनगी बितावत रहय। फेर संसो के बात ए रिहिस कि उँकर एके छिन बेटी चँदा जेकर बर नौकरिहा सगा देखत-देखत चार बछर होगे रिहिस। चँदा के उमर चालीसा लगे बर दु बछर कम रिहिस। सगा मन ठिकाना नइ परत रिहिस। ऐसना बेरा म पचास एकड़ खेत के जोतनदार बने रोठहाँ सगा धर के सुकलहा हर अपन मितान दुकलहा करा आनिस। फेर दुकलहा हर ये कहिके सगा मन ल मुँहाटी ले लहुँटा दिस के लइका के कुछु नौकरी चाकरी नइ हे कहिके। मोर बेटी ह अतेक पढ़े लिखे हे त नौकरिहा दामाद होना चाही। पाछु सुकलहा हर कहिस घलोक देख मितान खेती किसानी का नौकरी ले कम आय ! मनखे के चाल चलन अउ चरित ह ...
एक युग, एक विचार
कविता

एक युग, एक विचार

रूपेश कुमार चैनपुर (बिहार) ******************** ग्वालियर, मध्यप्रदेश की पावन धरा ने जन्म दिया एक बालक को, नाम हुआ अटल, स्वरों में कविता, शब्दों में सत्य, वाणी थी सरल, मन प्रखर, अडिग, स्थिर, निर्मल। पिता शिक्षक संस्कारों की छाया, माँ की ममता, राष्ट्र का स्वप्न, बाल्यकाल से ही चेतना जागी, भारत बने विश्व में उज्ज्वल स्वर्ण-रत्न। कलम उठी तो कविता बह चली, राजनीति आई तो सेवा बन गई, विचारों में मतभेद रहे होंगे, पर मर्यादा कभी न टूटी, न झुकी, न गई। जनसंघ से संसद तक की यात्रा, संघर्षों से रचा हुआ इतिहास, एक नहीं, कई बार पराजय मिली, पर हर हार बनी भविष्य का प्रकाश। “हार नहीं मानूँगा” कहने वाला, स्वयं उस पंक्ति का प्रमाण था, लोकतंत्र का सच्चा प्रहरी वह, विपक्ष में भी जिसकी वाणी समाधान था। तीन-तीन बार बने प्रधानमंत्री, पर सत्ता कभी सिर पर न चढ़ी, सरल ज...
तैयारी जीत की
कविता

तैयारी जीत की

अशोक कुमार यादव मुंगेली (छत्तीसगढ़) ******************** नया साल बड़े ही धूमधाम से मनाना है। कुछ पाने के लिए, कुछ कर दिखाना है।। जीत होगी या हार होगी, मत सोचो तुम, हर हाल में मंजिल के शिखर तक जाना है।। जब तक साँसे चल रही है, तुझमें भी है दम। कई बाधाएँ आएँगी, रुक मत, बढ़ा कदम।। गिरकर फिर उठ, संभाल अपने आप को, आँधी और तूफान बन, वज्र का बना बदन।। छद्मरूप त्याग कर, भाग्य का लिखा बदल। नये ज्ञान-विज्ञान से, जीवन में ला हलचल।। असंभव को संभव कर, तू कुछ बन सकता है, विद्या प्रकाश पुस्तक में ध्यान लगा हर-पल।। अंतर्मन की ज्वालामुखी को, ज्ञान से धधका। अपने आप को लक्ष्य से कभी भी मत भटका।। तू है धुरंधर, अंधाधुंध कर परीक्षा की तैयारी, अंतिम में मिलेगी कामयाबी, कर्म में मन लगा।। परिचय : अशोक कुमार यादव निवासी : मुंगेली, (छत्तीसगढ़) संप्राप्ति : शिक्षक एल. बी., संस्थापक एवं अध्यक...
कलयुग
कविता

कलयुग

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** आज के युग मे मानो कलियुग प्रगट हो गया है, लगता है कोई बुरा समय एक आकर लेकर दुनिया पर छा गया है ! चारों ओर अशांति विद्रोह और भय व्याप्त हो गया है, विचारों में जहर और व्यवहार में आक्रोश हृदय में घर कर गया है ! गलत को सही साबित करने की कला आ गई है, झूठ को सच का मुखौटा पहनने का हुनर आ गया है ! पाप-पुण्य के मायने बदल गए हैं हर इंसान स्वार्थी हो गया है ! कलयुग कोई तिथि या युग नहीं जब अनाचार- मन और विचारों में मे व्याप्त हो जाए, वही कलयुग अवतरित हो जाता है ! ये मन के पापों की एक अवस्था है, जो सब कुछ तहस नहस कर देता है, पाप समाज में नहीं इंसान के भीतर जन्म लेता है और वही विचार कर्म बनते है ! कलयुग की स्तिथि से हमको स्वयं से ही बाहर निकलना होगा, करुना और प्रेम का मार्ग पकड़ना होगा, ...
अधूरे ख्वाबों के पार जाना है मुझे
कविता

अधूरे ख्वाबों के पार जाना है मुझे

सुशी सक्सेना इंदौर (मध्यप्रदेश) ******************** अधूरे ख्वाबों के पार जाना है मुझे दिल जो चाहे चांद तो, पाना है मुझे। जी लिए बहुत इस दुनिया के लिए खुद से किया वादा भी तो, निभाना है मुझे। मंदिर मस्जिद में पूजूं ये हसरत नहीं इक मूरत प्रेम की दिल में, बिठाना है मुझे। राहों में गिरेंगे और संभालेंगे भी कभी जिंदगी के सफर को यादगार बनाना है मुझे। परिचय :- सुशी सक्सेना निवासी : इंदौर (मध्यप्रदेश) इंदौर (मध्यप्रदेश) निवासी सुशी सक्सेना वर्तमान में, वेबसाइट द इंडियन आयरस और पोगोसो ऐप के लिए कंटेंट राइटर और ब्लॉग राइटर के रूप में काम करती हैं। आपकी कविताएं और लेख विभिन्न पत्रिकाओं और समाचार पत्रों में प्रकाशित हुए हैं। आपने कई संकलनों में भी योगदान दिया है एवं कई प्रशंसा पत्र और पुरस्कार प्राप्त किए हैं। विशेष रूप से, आपको अनुराग्यम द्वारा गोल्ड मेडल एवं वंदे ...
नववर्ष
कविता

नववर्ष

डॉ. भगवान सहाय मीना जयपुर, (राजस्थान) ******************** नववर्ष जगा देगा फिर से, जीवन में टूटी उम्मीदों को। वादा कर लेगा हताशा से, व्यक्ति सपने पूरे करने को। प्रफुल्लित होगी मन मयूरी, रंग चढ़ेगा आशा किरणों को। पल्लवित होगा हृदय चमन, यूं हौसला मिलेगा कदमों को। फिर जज्बा जगेगा अंतस में, कर्मठ बांध लेगा मुट्ठियों को। आस को परवाज मिलेंगे फिर, कसूमल रंग नव खुशियों को। सुदूर क्षितिज से राह मिलेगी, कमर कसे चल पड़ेंगे लक्ष्य को। अब सुलझेंगी उलझी गुत्थी, नवल उमंग मिलेगी कर्मों को। जोश जुनून उम्मीद उत्साह, पुनर्जीवित हुये सब नव वर्ष को। सुखी जीवन वेदना होगी दूर, परिचय :- डॉ. भगवान सहाय मीना (वरिष्ठ अध्यापक राजस्थान सरकार) निवासी : बाड़ा पदम पुरा, जयपुर, राजस्थान घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है...
खाली हाथ आये
कविता

खाली हाथ आये

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ******************** खाली हाथ आये है खाली हाथ जाना है। फिर क्यों संसार में बटोर कर अपना वक्त गवाना है। ******** खाली हाथ आये है जरूर पर खाली हाथ नहीं जायेंगे। अच्छे कर्म कर कर लोगों की दुआए ले जायेंगे। ******** जितना ही हम एकत्र करेंगे सब यहाँ रह जायेगा। केवल कर्म का पिटारा हमारे साथ जायेगा। ******** अब जोड़ो मत बांटना शुरू करो। अपनी ज़िन्दगी को खुशियों से भरो। ******* सबसे अच्छा व्यवहार करो सबके काम आओ। सबकी करो भलाई दुनिया में यही यश कमाओ। ********* जब आप नहीं रहेंगे लोग आपका व्यवहार याद करेंगे। और आप मृत्यु के बाद भी लोगो के दिलों में आप ज़िंदा रहेंगे। ******** अब संचय को छोड़कर प्रभु वंदन में लग जाओ। और इस दुनियां के सब सागर से तर जाओ। ********* परिचय : डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" निवासी : चिनार-२ ...
पत्थरों पर उकरे हुए हैं कई सवाल
कविता

पत्थरों पर उकरे हुए हैं कई सवाल

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* पत्थरों पर उकरे हुए हैं सदियों से कई सवाल हर किसी ने वक़्त के सीने पे अपना हाल उतारा है। किसी ने शिलालेख में गुदवा दी अपनी दास्तां, किसी ने काग़ज़ की पनाह ली, कुछ हवाओं से कह गए दिल का हाल, किसी ने फूलों को अपनी कहानी सुना दी, चाँद के पास भी होंगे अनगिनत फ़साने, रात की खामोशियाँ… ये खामोश खड़े पर्वत-पठार, दरख़्त और समंदर की नम रेत में, कोहरे में भीगी घास की नमी और पत्तियों की सरसराहट में किसी ने नदियों को सौंप दिए होंगे भावनाओं के अधजले ख़त, कोई सागर की लहरों में अपने अरमान बहा गया होगा, और कहीं झरनों की फुहार में अपने अधूरे सपने भिगो दिए होंगे सन्नाटों में भी कुछ गूंज रहे होंगे अनकहे गीत, कुछ शिशिर की हवाओं में अपने राज़ छोड़ गए होंगे, पवन की सरसराहट में सूरज की पहली किर...
छत्तीसगढ़िया दिलवाला होथे
आंचलिक बोली, कविता

छत्तीसगढ़िया दिलवाला होथे

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** (छत्तीसगढ़ी बोली) हम वो करम करबो जउन इंसानियत अउ मानवता बर जरूरी हे, बाकी हर हमेशा हम देखत हन हमर घेंच म हर बेरा लटके छुरी हे, ए सब करे बर न कोनो देबी चाही न कोनो देवता, हमर अपन छत्तीसगढ़िया परब आय छेरता, जिहां अपन उपज के खुशी म सगरो मिलजुलके मनाथन तिहार, एही म हमर जीत अउ एही म हमर हार, जीत एखर बर के हम दिलवाला हन, हार एकर बर नइ दिखय चढ़ाय जालापन, एमा काखरो कोनो योगदान नइ हे, सब दान करत हन अइसना हमर हिरदई हे, मुठी भर अन्न अउ पेट भर खाना, सदा दिन ले करत आत हे छत्तीसगढ़िया दीवाना, जतको कमाएन पायेन, जादा रहय चाहे कम अपन बर हाथ बढ़ायेन, छेरछेरा कोनो धार्मिक तिहार हे न कोनो सामाजिक, हमर हिरदे ले जुरे तिहार हे वास्तविक, त आवव तिहार खुलके मनावव, छत्तीसगढ़िया मन दिलवाला होथे सबो ल बतावव। ...
खेद है – एक राष्ट्रीय भावना का आधुनिक संस्करण
व्यंग्य

खेद है – एक राष्ट्रीय भावना का आधुनिक संस्करण

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** बड़े खेद की बात है कि इस संसार में दो ही चीज़ें सर्वत्र उपलब्ध हैं सड़कों पर खुदा और लोगों की ज़ुबान पर खेद। आजकल खेद बड़े ठसक के साथ प्रकट किया जा रहा है। जहाँ देखो, वहीं खेद। ट्रेन लेट हो जाए तो खेद, ट्रेन रद्द हो जाए तो गहरा खेद, और अगर समय पर आ जाए तो भी एहतियातन खेद क्योंकि इतनी चमत्कारी घटना पर शक होना स्वाभाविक है। रेलवे विभाग तो तब तक आपको डिब्बे में बैठने ही नहीं देता, जब तक सौ बार खेद प्रकट न कर ले। यात्री को भरोसा दिलाना ज़रूरी है कि लापरवाही हुई है, पर भावना सच्ची है। सोशल मीडिया ने खेद को लोकतांत्रिक बना दिया है। पहले खेद करने के लिए घटना चाहिए थी, अब बस नेटवर्क चाहिए। कोरोना काल में तो खेद की ऐसी बाढ़ आई कि कोई अगर गलती से मुस्कुराता हुआ फोटो डाल दे, तो लोग टिप्पणी में RIP ...
स्वामी विवेकानन्द की जयंती
आलेख

स्वामी विवेकानन्द की जयंती

मन्नत रंधावा कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** भारत में स्वामी विवेकानन्द की जयंती, अर्थात १२ जनवरी को प्रतिवर्ष राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र संघ के निर्णयानुसार सन् १९८४ ई. को 'अन्तरराष्ट्रीय युवा वर्ष' घोषित किया गया। इसके महत्त्व का विचार करते हुए भारत सरकार ने घोषणा की कि सन १९८४ से १२ जनवरी यानी स्वामी विवेकानन्द जयंती (जयन्ती) का दिन राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में देशभर में सर्वत्र मनाया जाए। राष्ट्रीय युवा दिवस का महत्व और उद्देश्य :- राष्ट्रीय युवा दिवस मनाने का महत्व और उद्देश्य आज के युवाओं को भविष्य में आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करना और उन्हें अपने देश के प्रति कर्तव्यनिष्ठ और जागरूक बनाना है। राष्ट्रीय युवा दिवस युवाओं को समर्पित एक विशेष दिन है। इस दिन का उद्देश्य युवाओं में समझ, प्रशंसा और ज़िम्मेदारी को बढ़...
विरह का सन्नाटा
कविता

विरह का सन्नाटा

बाल कृष्ण मिश्रा रोहिणी (दिल्ली) ******************** सूरज छुपा धुँध के पीछे, आँखों में ठहरा आसमान। इस अकेलेपन की रात में, दिल ढूँढ रहा तेरे निशाँ। शहर सो गया, नींद के आगोश में, मेरा जहाँ बस तेरी यादों में सिमटा। चीख़ रहा अंदर सन्नाटा, बाहर का मौसम बदला। हर साँस में बस तेरी खुशबू, हर धड़कन पे तेरा पहरा। सन्नाटों में तेरा साया, नींद के आगोश में, शहर समाया। धुंधले हुए हैं रास्ते सारे, कैसे ढूँढूँ मैं अपनी डगर? खो गए हैं सारे सहारे, कहाँ ले जाएगा यह सफ़र? ख़ामोशी ने शोर मचाया, दिल ने फिर खुद से की उलझन। टूटे सपनों की राख तले, दबी हुई है मेरी चुभन। क्यों थम न जाता ये जीवन, थक-सा गया हर एक क्षण। चाँद भी आज बादलों का, ओढ़कर आया है कफ़न। परिचय :- बाल कृष्ण मिश्रा निवासी : रोहिणी, (दिल्ली) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुर...
संस्कृत है हिंदी की जननी
कविता

संस्कृत है हिंदी की जननी

संजय कुमार नेमा भोपाल (मध्य प्रदेश) ******************** संस्कृत है हिंदी की जननी यही भारत माता की पहचान। विश्व भौतिकवाद से परे हमारी हिंदी। कई सुरों से निकाल कर, जन-जन के अंतर मन का भाव है हमारी हिंदी। भारत माता के इस भाव का तिलक करें, इसका सम्मान करें। तुलसीदास, सूरदास कई ऋषि मुनियों की लेखनी हमारी हिंदी। अंतर मन के भाव जागृत कर सारे जग को ज्ञान हमारी भाषा देती। हृदय से मिलाकर एक रखती, पर चिंता यही अंग्रेजी भाषा अब खंड-खंड कर चीर हरण कर रही। करें प्रतिज्ञा हर दिन हर पल हिन्दी दिवस मनाकर, अपनी भाषा का सम्मान बढ़ाना है। परिचय :- संजय कुमार नेमा निवासी : भोपाल (मध्य प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। प्रिय मित्र, शुभचिंतक एवं परिवारजन आपको प्रेषित मेरी नई स्वरचित रचना, कृपया...
हिंदी हमारी शान है
कविता

हिंदी हमारी शान है

संजय वर्मा "दॄष्टि" मनावर (धार) ******************** हिंदी हमारी शान है हमको इस पर अभिमान है सीधी इसकी तान है, यही तो इसकी पहचान है। अंग्रेजी को मत घोलो बोलना है तो शुद्ध हिंदी बोलो हिंदी में ही कार्य करों भाषा सम्मान पर उपकार करो। वतन है हिन्दोस्तां हमारा हिंदी बोलने से लगता प्यारा हिंदी वैज्ञानिक भाषा है बोलो इससे ही तो जगत सारा। धर्मनिरपेक्षता की हर जुबान पर बैठा जीवन सारा है बोलो हिंदी लिखो हिंदी, पढ़ो हिंदी सब यही तो नारा है। परिचय : संजय वर्मा "दॄष्टि" पिता : श्री शांतीलालजी वर्मा जन्म तिथि : २ मई १९६२ (उज्जैन) शिक्षा : आय टी आय निवासी : मनावर, धार (मध्य प्रदेश) व्यवसाय : ड़ी एम (जल संसाधन विभाग) प्रकाशन : देश-विदेश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ व समाचार पत्रों में निरंतर पत्र और रचनाओं का प्रकाशन, प्रकाशित काव्य कृति "दरवाजे पर दस्तक...
सेतु का काम करती हिन्दी
आलेख

सेतु का काम करती हिन्दी

डाॅ. कृष्णा जोशी इन्दौर (मध्यप्रदेश) ******************** आज हम बड़े ही रोचक विषय पर बात करेंगे जी हाँ हिन्दी न केवल भाषा वरन भारतीय संस्कृति और एकता का प्रतीक हैं। हम सभी जानते है हिन्दी के जनक और जननी कौन है? जी भारतेन्दु हरिशचंद्र जी का नाम तो सुना ही होगा वो न केवल हिन्दी के जनक कहलाते बल्कि दुनिया में आधुनिक साहित्य के जनक कहलाते हैं। वहीं जननी संस्कृत जी पर हिन्दी आज भी सबसे सरल, प्रिय, विकसित भाषा है जिसे राज भाषा का दर्जा प्राप्त है, वैश्विक स्तर पर हिन्दी ने अपनी पहचान यूँ ही नहीं बनाई, आज ना केवल भारत में अन्य देश में भी हिन्दी भाषा प्रचलित है। यह तो हम हिन्दी के विकास और पहचान कैसे बनाई उसको जाने पर हिन्दी का योगदान देश के विकास में और देश को समृद्ध बनाने में अहम भूमिका निभाता रहा, हिन्दी संघ की भाषा है जो हमें जोड़े रखती हैं। यह वो मज़बूत कड़ी है जो हमें जड़ों से जोड...