मगर पता कब चला
छत्र छाजेड़ “फक्कड़”
आनंद विहार (दिल्ली)
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समय को सब कुछ सहते देखा
मजबूर सत्य को बहकते देखा
मगर पता कब चला
घर की दीवारों को...
गिरने लगे तो फिर गिरते ही गये
रास्ते पतन के अविरल बढते गये
मगर पता कब चला
विश्वास के आधारों को...
कदम बढा भी दिये गये अब आगे
स्वार्थ के लिए सिद्धांत ऊंचे टांगे
मगर कब किसने देखा
लौट कर आते सवारों को...
हंस हंस कर जीवन जी ही लिया
खुशियों को गम छूने ही ना दिया
मगर कब किसने देखा
नभ में रोते हुये तारों को...
चांद के उजालों में रात रोते देखा
पाप और धर्म को संग सोते देखा
मगर कब किसने देखा
खाली होती मजारों को...
भाई ने भाई से मुंह फेर लिया
संबंधों को सियासत घेर लिया
मगर कब किसने देखा
जात-धर्म के चटखारों को...
नेताओं से डर को सहमते देखा
कुर्सी हेतु धर्म को मिटते देखा
मगर कब पता चला
लुटने का अपने ह...






















