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मनमानी
कविता

मनमानी

मनोरमा संजय रतले दमोह (मध्य प्रदेश) ******************** कैसा समय आ गया अब कोई, किसी की ना सुनेगा..। मनमानी करेगा अरे.....अरे.. ये कोई में ... माँ बाप भी शामिल है इस बात पे विचार करो चौथी पाँचवी के बच्चे माँ बाप को धमका रहे आप ने हमसे जिद्द की हम घर छोडकर चले जायेगे अब आप ही बताये ऐसे बच्चे समाज के क्या काम आयेगे.. इन्हें तो ना सुनने की आदत ही नहीं चाहे वो माँ बाप से चाहे आफिस में चाहे रिश्तेदार से... सोचिये...ये फिर कैसे शादी कर पायेगे.. एक दूसरे से सामंजस्य बनाना ही नहीं चाहते कैसे रिश्ते टिकेगे.. इसलिये ये लिव इन रिलेशनशिप चल रहा फल फूल रहा इस रिश्ते को हिन्दी मे क्या कहे.. सोच के भी शर्म आती है आज बेटो बेटी को विवाह तो नहीं करना पर विवाह के बाद का सुख चाहिए बच्चे चाहिए... आज के युवाओ के लिये बालीवुड ही आदर्श बना है तभी तो माँ बाप मुँह ...
भाई दूज
गीत

भाई दूज

मीना भट्ट "सिद्धार्थ" जबलपुर (मध्य प्रदेश) ******************** कहे बहिन की प्रीति सदा ही, भइया रीति चलाते रहना। घर आयेगी रूठी बहिना, भइया नित्य बुलाते रहना।। बहिना का है प्रेम निराला, पावन जैसे गंगा धारा। रक्षक भाई है बहना का, नित दूजे पर तन-मन वारा।। जुग-जुग जिए बहिन का भाई, यह आशीष दिलाते रहना। घर आयेगी रूठी बहिना, भइया नित्य बुलाते रहना।। भाई दूज का पर्व है प्यारा, खुशी हजारों लेकर आता। मंगल पावन तिलक लगाती, बहिना को त्योहार सुहाता।। प्रेम सदा छलकाता भाई, अद्भुत ज्योति जलाते रहना। घर आयेगी रूठी बहिना, भइया नित्य बुलाते रहना।। जुग-जुग जिए बहिन का भाई, प्रभु से वर ये माँगे बहिना। सुख समृद्धि सदा घर आये, झोली खुशियों से प्रभु भरना।। कृष्ण सुभद्रा सी है जोड़ी, नेहिल अमिय पिलाते रहना। घर आयेगी रूठी बहिना, भइया नित्य बुलाते रहना।। ...
जीवन का अभिशाप
गीत

जीवन का अभिशाप

भीमराव 'जीवन' बैतूल (मध्य प्रदेश) ******************** और रहा कितने दिन बाकी, राजन् पश्चाताप। हारा गणित हमारा लेकिन, जुमले सका न माप।। मुरझाई गमलों में सारी, रोपित आशाएँ। नागफनी-सी हुई पल्लवित, निंदित भाषाएँ।। तहज़ीबों की इस बस्ती में, पसरा है संताप।। सपने देखे उड़ने के जिस, उड़न-खटोले से। आडंबर का जिन्न बड़ा हो, निकला झोले से।। कुटिल नीति के कोड़े मारे, ये दिल्ली की खाप।। जकड़े हम बाजारवाद के, खूनी पंजों में। फँसे हुए हैं वोट बैंक के, बने शिकंजों में।। रखा हुआ है गिरवी अपना, अनुवांशिक आलाप।। उलझ गया सब ताना-बाना, भ्रमित नीतियों में। हिंसकपन बो रही व्यवस्था, राग-रीतियों में।। सूत्रधार ही लगता है अब, 'जीवन' का अभिशाप।। परिचय :- भीमराव 'जीवन' निवासी : बैतूल मध्य प्रदेश घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है।...
माँ पार्वती शक्ति तांडव स्तुति
स्तुति

माँ पार्वती शक्ति तांडव स्तुति

बाल कृष्ण मिश्रा रोहिणी (दिल्ली) ******************** प्रचंड शक्ति रूपिणीं, नमामि देवी अंबिकाम्। जगत् जननीं जगन्मयीं, नमामि दिव्य चंद्रिकाम्॥ नृत्यति शिव सान्निध्ये, शक्ति तांडव कारिणी। दुष्ट दलन हारिणी, भक्त कष्ट निवारिणी॥ कनत कनक कंकणम्, झणत झणत नूपुरम्। रणत रणत डमरूम्, भरत सकल अम्बरम्॥ जटा मुकुट शोभितां, अर्ध चन्द्र धारिणीम्। त्रिशूल खड्ग धारिणीं, असुर गर्व हारिणीम्॥ महागौरी महाकाली, महालक्ष्मी स्वरूपिणी। सृष्टि स्थिति विनाशनी, मोक्ष मार्ग दर्शिनी॥ बाल कृष्ण मिश्रा मति, शक्ति चरणे अर्पिता। पातु मां जगदम्बिका, भक्ति भाव वर्धिता॥ परिचय :- बाल कृष्ण मिश्रा निवासी : रोहिणी, (दिल्ली) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विच...
दीपशिखा
कहानी

दीपशिखा

सुधा गोयल बुलंद शहर (उत्तर प्रदेश) ******************** आज उनकी मृत्यु को पूरा एक बरस हो गया है। मैंने उन्हें भुलाना चाहा है, पर वह एकांत के क्षणों में मेरे मन मस्तिष्क पर छा गई है। उसका व्यक्तित्व हावी हो गया है। वह मेरी पत्नी थी। अग्नि के सम्मुख सप्तपदी की साक्षी मेरी ब्याहता पत्नी उमा, जिसे मैंने पत्नी से अधिक कुछ नहीं समझा। पत्नी यानि पति का नाम, पति के बच्चे, पति का घर, रोटी कपड़ा यही सब एक पत्नी को चाहिए और मैं देता रहा। इसके अलावा भी और कुछ उसे चाहिए या मुझे कुछ देना है, इस कुछ को मैंने मात्र अपने लिए समेटे रखा। उसने भी कभी कुछ नहीं कहा। कभी कहीं असंतोष का भाव उसके चेहरे पर नहीं आया। वह पूर्णतया खुश थी। एक पत्नी को जो चाहिए था वह उसे मिला था। पति के रुप में मैं देने के योग्य था। तीस सालों तक वह मेरे साथ रही। पत्नी इतने दिनों तक एक आदत बन जाती है। यह मैं मानता हूं, पर आदत से प्र...
होली मा रंग लो
गीत

होली मा रंग लो

धर्मेन्द्र कुमार श्रवण साहू बालोद (छत्तीसगढ़) ******************** (छत्तीसगढ़ी गीत) उलझन मन ला दहन करें बर, बैठक रखही आज। काम क्रोध बैठक मा जरही, बरही खस्सू खाज।। दया क्षमा मन नियाय करही, बस्ती भर सकलाय। प्रेम प्रसादी सब ला मिलगे , रंग गुलाल उड़ाय।। अइसन बात धरव श्रोता जन, बदलव अब सब ढंग। असली रंग रंँगाहूँ सब झन, निकल जाय ये जंग।। कामी क्रोधी राजा जरगे, नइ बाँचिस हे राज। प्रहलाद पुत्र कैसे बचगे, सोचव सब झन आज।। काबर सच्चा भक्ति रिहिस हे, भगवन के अवतार । भजन भाव ला हिय मा धरथे, होथे जिनगी पार।। असली बचथे नकली जरथे, जलके होथे राख। पापी गगरी मा विष घुलथे, इही चुकाथे साख।। अत्याचारी भ्रष्टाचारी, भगवन करथे नाश। दू दिन के जिनगी सँगवारी, महको उपवन काश।। इही आय मधुबन वृंदावन, गीत भजन गा फाग। अहंकार के माथा फोड़व, रखव प्रेम अनुराग।। परिचय :- धर्मेन्द्र क...
शाल्मली: एक मौन सार्थकता
कविता

शाल्मली: एक मौन सार्थकता

विशाल त्रिवेदी "अल्पज्ञ" सेंधवा (मध्य प्रदेश) ******************** आकाश की नीलिमा को चुनौती देता, एक दरख्त खड़ा है नग्न शाखाओं पर सिंदूरी मशालें जलाए। उसे मलाल नहीं कि वह किसी के जूड़े की शोभा नहीं, न ही उसे दुख है कि देवताओं के चरणों तक उसका सफर नहीं पहुँचता। उसका सौंदर्य प्रदर्शन की वस्तु नहीं, वह तो एक 'होने' का उत्सव है। वह खिलता है तब, जब पतझड़ सब कुछ छीन लेता है, जब उम्मीद की टहनियाँ ठूँठ होने लगती हैं, तब वह रक्तिम आभा बनकर फूटता है- धैर्य का पर्याय बनकर। उसका धर्म किसी प्रशंसा का मोहताज नहीं, वह छाया नहीं देता, पर आश्रय देता है; वह खुशबू नहीं बाँटता, पर रंग भर देता है- उन रास्तों में, जिन्हें लोग 'सूखा' कह कर छोड़ देते हैं। उसकी सार्थकता उन पंछियों की चहचहाहट में है, जो उसकी ऊँचाई पर भरोसा करते हैं। सीखना हो तो सेमर से सीखें- कि समय पर ख...
मेरी मांँ
कविता

मेरी मांँ

किरण विजय पोरवाल सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** मन की बातें किसे बताए कौन है जो गले लगाये, समझे जो कोई मेरी बातें, वह तो मेरी माँ ही जाने। दुख-दर्द, दुख-सुख को जो जाने, मन के भाव को जो पहचाने, प्यार और दुलार की जो है जननी। संबंधो की जो है टहनी, उज्जवल भविष्य की कामना जो करती, निर्मल मन निर्मल है विचार, संस्कार और संस्कृति का रखे जो ख्याल, मान मर्यादा का जो पाठ पढाती, बच्चों का रखती जो खयाल, माँ तो माँ बस माँ होती है चन्दा सी शीतल है मां ,सुरज सा प्रकाश हे माँ माँ तो बस माँ ही होती है। परिचय : किरण विजय पोरवाल पति : विजय पोरवाल निवासी : सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) शिक्षा : बी.कॉम इन कॉमर्स व्यवसाय : बिजनेस वूमेन विशिष्ट उपलब्धियां : १. अंतर्राष्ट्रीय साहित्य मित्र मंडल जबलपुर से सम्मानित २. अंतर्राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना उज्ज...
मन की नम् माटी
कविता

मन की नम् माटी

सुषमा शुक्ला आबिदजान (अफ्रीका) ******************** मन की नम मिट्टी में जब भावों का बीज गिराया, आँखों की कोरों ने चुपके से जल बरसाया। पीड़ा की हल्की धूप में सपनों ने अंगड़ाई ली, आशा की कोमल कोंपल ने फिर मुस्कान सजाया। मन की नम मिट्टी में श्रद्धा का दीप जले, विश्वास की खुशबू से जीवन के आँगन पले। संघर्षों की धूल भले ही राहों में बिखर जाए, धैर्य की फसल उगे तो भाग्य के द्वार खुले। मन की नम मिट्टी में रिश्तों के फूल खिलें, ममता की सरिता बहे, प्रेम के मोती मिलें। अंतर की करुणा जब बन जाए हरियाली, सूखे से जीवन में फिर सावन झूमे खिलें। मन की नम मिट्टी में संस्कारों की जड़ हो, सत्य की धूप मिले, मर्यादा का अंकुर हो। लोभ की आँधी आए तो भी न डिग पाए, नीति का वटवृक्ष बने, आदर्शों का स्वर हो। मन की नम मिट्टी में ईश्वर का नाम पले, भक्ति का अंकुर फूटे, आत्मा के दीप जले। ...
नंदलाल से होली खेलें ग्वाल-बाल प्यारे
गीत

नंदलाल से होली खेलें ग्वाल-बाल प्यारे

डॉ. भावना सावलिया हरमडिया, राजकोट (गुजरात) ******************** नंदलाल से होली खेलें ग्वाल-बाल प्यारे। सबके तन-मन अति पुलकित हैं, झूम रहे सारे। रंग श्याम का चढ़ जाता है, होता उजियारा। जीवन में बहने लगती है, दिव्य अमृत धारा। माधव-राधा के दर्शन ये, जीवन को तारे। नंदलाल से होली खेलें, ग्वाल-बाल प्यारे। बाल-वृद्ध सब होली खेलें, राधा सखियों से, प्रीत भरी पिचकारी मारे, मोहन अँखियों से, होली का हुड़दंग मचा है, ज्यों द्वारे द्वारे। नंदलाल से होली खेलें, ग्वाल-बाल प्यारे। श्याम रंग की पिचकारी से, राधा शरमाईं, भीग गई चोली, चूनर सब, सखियाँ हरषाईं। मुरलीधर का प्रेम पड़ गया, राधा को भारे नंदलाल से होली खेलें ग्वाल-बाल प्यारे। गोपी-ग्वाले मिलकर खेलें, गोकुल में होली, राधा गोरी वो मतवाली, खेले हमजोली, मटक रहे राधा मोहन के, नयना कजरारे। नंदलाल से होली खेलें ग्वाल-बाल प्यारे। गि...
होली के रंग मस्ती के संग
कविता

होली के रंग मस्ती के संग

डॉ. संध्या शुक्ल 'मृदुल' मंडला (मध्य प्रदेश) ******************** मौसम हुआ है फागुनी, फागों पर छाया शवाब। हरम मन में सजने लगे, फिर रंग-बिरंगे ख्वाब। हर कली को है चूमता, चंचल भ्रर सदाबहार। फिजाओं में है घुल रही, देखो अब बसंती बयार। गली-गली में हो रही, अब रंगों की बरसात। रंग-बिरंगे से दिन हुए, हुई मस्ती वाली रात। बहके बहके से कदम, हो गई नशीली चाल। भंग की मस्ती में अब, तन मन हुए हैं बेहाल। अंगारों सा दहक उठा, गोरी का तन है आज। सुध बुध है बिसराय के, भूल गई वो सब काज। भींग गई लहंगा चोली, भींग गई चुनरी आज। गोरी का घूंघट सरका, तज करके सारी लाज। मुखड़ों पर हैं सज रहे, अब इंद्र धनुषी ये रंग। हुलियारी टोली निकली, फिर से मस्ती के संग। परिचय :- डॉ. संध्या शुक्ल 'मृदुल' निवासी : मंडला (मध्य प्रदेश) सम्प्रति : प्रदेशाध्यक्ष- अखिल भारतीय हिंदी से...
रंगो की बौछार
कविता

रंगो की बौछार

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** होली आई, होली आई रंगो की बौछार ला ई टेसु ओढे लाल चुनरिया पलाश अगन लगा ए रे। रंग, रंग मे भीगी गौरी छुप, छुप कर रंग डाले रे चली पिचकारी की बौछारे तन भीगे, मन भीगे और भीगे आंचल रे। आरती की थाली सजा ऐ घुघंट ओढे निकली सजनी बौछारो से बचती जाती चाल चले मतवाली रे। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचना संघ से जुड़ी आप शासकीय सेवा से निमृत हैं पीछेले ३० वर्षों से धार के कवियों के साथ शिरकत करती रही आकाशवाणी इंदौर से भी रचनाएं प्रसारित होती रहती हैं आप राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर द्वारा "हिंदी रक्षक राष्ट्रीय सम्मान २...
कर रहे गुंजन भ्रमर हैं
गीत

कर रहे गुंजन भ्रमर हैं

मीना भट्ट "सिद्धार्थ" जबलपुर (मध्य प्रदेश) ******************** कर रहे गुंजन भ्रमर हैं, आ गया मधुमास साजन। प्रेम से सुरभित जगत है, गीत गुपचुप गा रहा मन।। तन बँधा है मन सजन भी, प्रीत का बंधन निराला। देख नभ डोले धरा भी। नेह का ओढ़े दुशाला।। बह रही कलकल नदी भी, प्रीत सागर से सुहावन। कर रहे गुंजन भ्रमर हैं, आ गया मधुमास साजन।। भावना का है समर्पण, नित नया उल्लास भी है। आस है अभिसार की तो, मन जगा विश्वास भी है।। सीप सा मोती बसा हिय, है खनक अब नित्य कंगन। कर रहे गुंजन भ्रमर हैं, आ गया मधुमास साजन।। काँपता है गात मेरा, मोहती तेरी छुअन भी। काम रति संसर्ग है ये , है प्रणय का मधु मिलन भी।। सैकड़ों सपने सजा कर, आ गयी है आज दुल्हन। कर रहे गुंजन भ्रमर हैं, आ गया मधुमास साजन।। परिचय :- मीना भट्ट "सिद्धार्थ" निवासी : जबलपुर (मध्य प्रदेश) पति...
मुझे नफरत है पापा
कविता

मुझे नफरत है पापा

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** हां मैं बहुत नाराज हूं आपसे, आपसे मुझे नफरत है पापा, हमेशा हमसे झूठ बोलते हो, जहां प्रखर आवाज चाहिए वहां क्यों सब कुछ म्यूट बोलते हो, सारी परेशानियां सर पर लेकर कहते हो कोई समस्या नहीं है, मैं हूं ना सारी समस्याओं का मुकम्मल समाधान यहीं है, हमसे सच छुपाने की ये नौबत आ गई, खून बेचकर राशन लाने की क्यों नौबत आ गई, हमारी भूख सहने पर क्या भरोसा नहीं है, हम पर अविश्वास क्या धोखा नहीं है, हां पैसा तो कमाते हो, पर पैसा आने का सोर्स क्यों नहीं बताते हो, कहीं औलाद की उदर भरने के लिए हम औलादों से धोखा नहीं है, हमें विश्वास में ले लेने खोते क्यों मौका नहीं है, भीख मांगना पाप है आपने ही सिखाया, रिश्तेदारों से मांगने का गुर कहां से आया, कर्ज में डूब हमें क्यों पाल रहे हो, हमारे संघर्ष मय जीवन से ...
महिला उत्थान कार्यक्रम
व्यंग्य

महिला उत्थान कार्यक्रम

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** यहाँ एक ठरकी महाशय की महागाथा प्रस्तुत है, जिनकी ठरक किसी मनचले तूफान की तरह है कब, कहाँ, किसे उड़ा ले जाए, इसका कोई भरोसा नहीं। वैसे तो ये सरकारी नौकरी में हैं, लेकिन इन्हें लगता है कि समाज के इस आधे तबके के प्रति भी इनका दायित्व बनता है- जैसे भी, जहां भी, जितना भी बन पड़े… महिला उत्थान करना अनिवार्य है! तो ये खुद को "महिला सशक्तिकरण" का स्वयंभू मसीहा मान बैठे हैं। इनका दर्शन बड़ा स्पष्ट है जितनी अधिक महिलाओं का "उत्थान" करेंगे, उतनी ही अधिक इनकी आत्मा को तृप्ति मिलेगी। यूँ तो शादी-शुदा हैं, लेकिन सिर्फ घर की मुर्गी का ही उत्थान करें इस वहम से कोसों दूर हैं। इनका ध्येय वाक्य है- शादी-वादी सब ढकोसला है, असली मकसद तो महिलाओं के उद्धार में जीवन अर्पित करना है! महिला दिवस नज़दीक आते ही इन्...
रंग रसिया
भजन

रंग रसिया

कमल किशोर नीमा उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** होली खेलने बरसाना श्याम आया ग्वाल बालों की टोली संग लाया। प्रेम रसिया सब के मन को भाया राधा रानी को देख मन मे हर्षाया। होली….. सम दृष्टि है वो, कर्ता श्रृष्टि भी वो सारे रुपों मे है उसकी ही माया। भक्ति रस मे भाव विभोर भक्तों को अपने स्वरुप का दर्शन कराया। होली….. रगों का ग़ुबार बन छाया गगन मे केशरिया रंग श्याम के मन भाया। होली के रुप मे प्रेम की वर्षा कर रंग रसिया जगत मे वो कहलाया। होली….. परिचय :- कमल किशोर नीमा पिता : मोतीलाल जी नीमा जन्म दिनांक : १४ नवम्बर १९४६ शिक्षा : एम.कॉम, एल.एल.बी. निवासी : उज्जैन (मध्य प्रदेश) रुचि : आपकी बचपन में व्यायाम शाला में व्यायाम, क्षिप्रा नदी में तैराकी और शिक्षा अध्ययन के साथ कविता, गीत, नाटक लेखन मंचन आदि में गहन रूचि रही है। व्यवसाय सेवा : आप सार्वजनिक स्वास्थ्य वि...
मौन हूँ … अनभिज्ञ नहीं
कविता

मौन हूँ … अनभिज्ञ नहीं

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** शांत हूँ, मौन हूँ किन्तु अनभिज्ञ नहीं हूँ दर्द को मुस्कराहट में छुपाना जानती हूँ एक कहानी हूँ, पर अधूरी नहीं!! प्रेम धर्म निभाती हूँ करुणा से भरा हृदय रखती हूं संवेदनाओं से भरी हूँ आरंभ हूँ अंत नहीं! कभी उकेरी हुई भावनाओं से ओतप्रोत, कभी भ्रमित होती कल्पनाओं एवं वास्तविकता में, कभी तराशी गई कभी नकारी गई हूँ दिलों की अभिव्यक्ति बनी हूँ खामोशी नहीं!! खुशियों की बरसात में छुपकर रहने वालों को, हँसी की दो बूंद के लिए तरसते देखा है, अभिमान मे डूबे रहने वालों को तन्हाई में छुपकर रोते देखा है, सपनों को पूरा करने का हौसला रखती हूँ नारी हूँ, किन्तु बेबस-लाचार नहीं!! जीवन के सही अर्थ को समझना चाहती हूँ, स्नेह और करुणा का दीपक चारों ओर जलाना चाहती हूँ, स्व चेतना के प्रकाश से आंतरि...
कर्मो का फल
कविता

कर्मो का फल

पुष्पा खंगारोत जयपुर (राजस्थान) ******************** ये वक़्त का फेर कहो या कर्मो की गाथा क्योंकि, जब समय है आता तो ईश्वर भी नही बच पाता।। ना राजा दशरथ कर्मो के फल वश बाण चलाता, ना मंथरा विष की वाणी घोलती ना केकई राम को वन का मार्ग दिखाती।। ना युद्ध में कृष्ण ने छल किया होता ना माँ गांधारी को क्रोध आता, ना श्राप वश ईश्वर होने पर भी मानव मृत्यु का दंश मिलता।। ना भीष्म से नारी का अपमान होता ना अंबा ने श्रीखंडी का रूप मांगा होता, ना अर्जुन ने उनकी ओट ली होती ना भीष्म को बाणो की शय्या मिलती।। ना पिता की मृत्यु पर अस्वथामा ने क्रोध किया होता ना पांडवो के वंश को निंद्रा मे चिर निंद्रा देते, ना ज़ख़मो मे रिस्ते खून के संग चिरंजीवी होके अकेले वनों मे भटकने का श्राप मिलता।। परिचय : पुष्पा खंगारोत निवासी : जयपुर (राजस्थान) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाण...
एक इल्जाम
कविता

एक इल्जाम

डॉ. राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** एक इल्जाम मेरे नाम आया है न होते हुए भी मोहब्बत सरेआम मेरा नाम आया है। मैं ढूंढता रहा हर जगह खुद को ही न जाने क्यों फिर भी मेरा नाम किसी ओर के साथ आया है। लोग पूछते रहे मुझे मेरे गम का कारण और मैं हर गम में खुदा तेरा नाम हर बार लेता आये हूँ। परिचय :-  डॉ. राजीव डोगरा "विमल" निवासी - कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) सम्प्रति - भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल, ठाकुरद्वारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। प्रिय मित्र, शुभचिंतक एवं परिवारजन आपको प्रेषित मेरी नई स्वरचित रचना, कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...🙏🏻😊💐💐💐 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी रचनाएँ प्रकाशित...
होली खेल रहे कन्हाई
मुक्तक

होली खेल रहे कन्हाई

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, (मध्य प्रदेश) ******************** होली मस्ती लेकर आई, खेल रहे कन्हाई। बरसाने से राधारानी, दौड़ी-दौड़ी आई। खेल रहे ग्वाले-ग्वालाएँ, मुखड़े हैं रंगीन, रंग-अबीरों की आभा तो, सारे ब्रज में छाई।। खेल रहे देवर-भौजाई, उल्लासित है तन-मन। जीजू और सालियाँ खेलें, इतराता है आँगन। मची हुई हुड़दंग आज तो, हुरियारों का ज़ोर, लगता है पल में जी लेंगे, अब तो सारा जीवन।। गले मिल रहे प्रीति लिए दिल, ख़त्म हुई सब दूरी। आज सभी होली में डूबे, नहीं शेष मजबूरी। गाँव-शहर, गलियों-सड़कों में, रँग डालो का शोर, बीवी लगती मदिरा जैसी, और प्रेमिका नूरी।। चला रही है आज पड़ोसन, नयनों से तो तीर। अपुन हो गए घायल ज़्यादा, दिल ने पाई पीर। मैंने मौका पाकर उसका मुख कर डाला लाल, मैंने मन के अरमानों को पिला दिया मृदु नीर।। परिचय :- प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे जन्म : २५-०९-१९६१ ...
सतरंगी दुनिया-१८
व्यंग्य

सतरंगी दुनिया-१८

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ******************** ईमानदारी का महत्व इसी बात से समझ में आता है, कि जो व्यक्ति स्वयं गलत काम करता है, परंतु अपने नौकर से ईमानदारी की अपेक्षा करता है। वफादार सभी कोई चाहते हैं, परन्तु स्वयं कोई बनता नहीं चाहता। *हमारे देश में सरकारी अस्पताल का मतलब है- जान से हाथ धोना, और प्राईवेट अस्पताल का मतलब है-जायदाद से हाथ धोना, इसलिए समझदार बनिए और अपनी सेहत का ध्यान रखिए, ताकि आपको अस्पताल के चक्कर काटने पड़ें।* जो दूसरों को इज्जत देता होता है, असल में वो इज्जतदार होता है, क्योंकि इंसान दूसरों को वही दे पाता है, जो उसके पास होता है। *एक बात समझ से परे है कि 2 अक्टूबर गांधी जयंती पर शराब के ठेके बंद रहते हैं और ३० जनवरी गांधी जी की मृत्यु के दिन शराब के ठेके खुले रहते हैं।* रुद्राक्ष हो या इंसान, एकमुखी बहुत कम ही मिलते हैं। उपदेश और सलाह हमारे ...
तुम पर ही फ़िदा हूँ
कविता

तुम पर ही फ़िदा हूँ

अशोक कुमार यादव मुंगेली (छत्तीसगढ़) ******************** मैं तुम्हें चाहता हूँ, तुम पर ही मर मिटा हूँ। प्यार करता हूँ तुझे, तुम पर ही फ़िदा हूँ।। धड़कनें कह रही हैं, कुछ सुनो तो ज़रा। पास आओ ना तुम, दूर क्यों हो भला? मन की बातें बता दूँ, वर्षों के बाद मिला हूँ। प्यार करता हूँ तुझे, तुम पर ही फ़िदा हूँ।। पास-पास हम हैं, मिलन की घड़ी आई है। रंग-बिरंगे बाग दिखे, रुत ने ली अंगड़ाई है।। खुशबू बिखेर दो ना, कुसुम बन खिला हूँ। प्यार करता हूँ तुझे, तुम पर ही फ़िदा हूँ।। तुम गीत बन जाओ, मैं संगीत बन जाऊँ। तुम हो हमजोली, मैं कविमीत बन जाऊँ।। लिख कर कविता, कल्पनाओं से घिरा हूँ। प्यार करता हूँ तुझे, तुम पर ही फ़िदा हूँ।। जीत की राहें, फैलाती हैं बाँहें, आ भी जा। खुशी के पल, ना जाए ढल, मान भी जा।। तुम हो बसंत बहार, मैं बदलती फ़िज़ा हूँ। प्यार करता हूँ तुझे, तुम पर ही फ़िदा हू...
हाथ मिला
कविता

हाथ मिला

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** हाँ- यदि दम है… तो हाथ मिला। हमें गले लगा, हमें हँसा-खिलखिला। चाय नहीं तो कम से कम अपने घर पानी पिला। मगर… आपके रवैये से हम निराश हैं, इंसानियत के लिए इंसानों से ही हताश हैं। कहो- सचमुच मिट गया है जातिभेद? तो आ… सबको बता। हमें छूने दे वही घड़ा, जिसके लिए कभी अपना प्राण गँवाना पड़ा। सिर्फ समरसता की बयार बहाते हो, अपने घर से लाया भोजन अपनी ही थाली में फोटो खिंचवा खाते हो। मूर्ख बना सकते हो चंद अनपढ़ों को, मगर तोड़ोगे कैसे ये जमे हुए सामाजिक घड़ों को? हमने हमेशा अमन और शांति का साथ दिया है, हुई ज्यादतियाँ- प्यार पाकर भुला दिया है। हमने नहीं रखा कभी कोई गिला… पर आज भी पूरे दम से पूछते हैं- यदि सच में बराबरी का हौसला है, तो आओ… हाथ मिला। परिचय...
रामायण सार
कविता

रामायण सार

सुषमा शुक्ला आबिदजान (अफ्रीका) ******************** (१) आदर्शों की अयोध्या में जन्मा मर्यादा का उजास, राम बने धर्म-दीप, जिनसे जग ने सीखा विश्वास। राजा दशरथ की वाणी, वचन बना पथ का शूल, त्याग की कसौटी पर चढ़ा, राजसिंहासन का मूल। (२) वन-पथ पर संग सीता, लक्ष्मण बने छाया-सार, कांटों में भी खिला कुसुम, प्रेम रहा आधार। शबरी के बेरों में मिला भक्ति का निर्मल स्वाद, साधारण हृदय में बसता, ईश्वर का संवाद। (३) अहंकार के रथ पर चढ़ा, लंका का वह अभिमान, सीता-हरण से काँप उठा, मानव-मूल्य विधान। अशोक-वाटिका में धैर्य, दीपक-सा जलता रहा, नारी-सम्मान का शिखर, इतिहास लिखता रहा। (४) हनुमान बने सेतु-स्वप्न, शक्ति का संयम रूप, वानर-सेना ने बाँधा, आशा का दृढ़ अनूप। राम-रावण संग्राम में, नीति ने पाई जीत, अधर्म ढहा, धर्म उठा, सत्य हुआ प्रतिष्ठित। (५) अयोध्या लौटा उजियारा, दीपों...
निहिरा
कुण्डलियाँ

निहिरा

मीना भट्ट "सिद्धार्थ" जबलपुर (मध्य प्रदेश) ******************** प्यारी इस मुस्कान पर, सब जाते बलिहार। अधरों पर उँगली रखी, बहती है रसधार।। बहती है रसधार, माथ ज़ुल्फें घुँघराली। मिश्री जैसे बोल, बड़ी है भोली-भाली।। लाल-लाल हैं गाल, देख आँखें कजरारी। करते सभी दुलार, नैनिका लगती प्यारी।। जाती शाला नैनिका, बरसे सावन झूम। बारिश से बचके चली, माँ का माता चूम।। माँ का माथा चूम, लगाती बचने छाता। होती गीली फ्राक, मगर सावन है भाता।। हर पग रखे सँभाल, बूँद रिमझिम है गाती। हर्षित होकर आज, नैनिका शाला जाती।। पानी में सँग खेलती, निशदिन करे दुलार। मछली भाती नैनिका, करती उसको प्यार।। करती उसको प्यार, खिलाती उसको दाना। निहिरा रहती साथ, मधुर फिर गाती गाना।। रंग-बिरंगी मीन, कहें सब जल की रानी। देती है संदेश, सुनो जीवन है पानी।। परिचय :- मीना भट्ट "सिद्धार्थ" निवासी ...